हम जो साँस लेते हैं ज़िन्दगी के लिए

हम जो साँस लेते हैं ज़िन्दगी के लिए
तुझे भी माँग लेते हैं बन्दगी के लिए

ये इनायत की ख़ुदा ने तुमको बनाया
ख़ैर! कोई तो है मेरी अवारगी के लिए

यह हुस्न जो ख़ुदा ने तुमको बख़्शा है
इक यही नाज़ है मेरी सादगी के लिए

तुम आये रंग आये और बहार आयी
बादल बरसे हैं दिल की लगी के लिए

हो कुछ तो मुश्किल मुझे इस इश्क़ में
एक हद तो चाहिए दीवानगी के लिए

बनती हैं मेरे ख़ाबों में किसी की तस्वीरें
उठती है इक आग तिश्नगी क लिए

सीना बहुत सीमाब है मेरा बेक़रारी में
इक नयी सहर नयी ताज़गी के लिए

सनम मुझको मैं सनम को देखता हूँ
क्या कुछ और है दिल्लगी के लिए

हम जो शाम ही से चराग़ जलाये बैठे हैं
दिल में जो डर है सो तीरगी के लिए

खुला है मेरा बाइसे-इश्क़ उन पर
मैं हैरान हूँ उन की हैरानगी के लिए

मुद्दा कहूँ कि न कहूँ उस बुत से
मैं करूँ क्या दिल की बेचारगी के लिए

जताऊँ उसे इश्क़ किस तरह ‘नज़र’
बोसा, दिलो-जाँ क्या दूँ पेशगी के लिए

शब्दार्थ:
तिश्नगी: प्यास; सीमाब: भारी; तीरगी: अंधेरा
बाइसे-इश्क़: इश्क़ की वजह; बोसा: चुम्बन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उस्लूब, उस्लूब, उस्लूब

उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं

* लेखन के नियम अथवा शैली


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में
क्यों खर्च नहीं होती साँस जीने में

मेरी बाक़ी ज़िन्दगी का तुम ही सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नामे-इश्क़ जायेगा मेरा सब-कुछ
क़िस्मत क्यों नहीं कहती आज कुछ

नाख़ुदा कश्ती को कब मिलेगा सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

‘नज़र’ को नयी ज़ीस्त दी तुमने शीना
जीने का तुमने सिखाया मुझको क़रीना

तेरे ही साथ मैंने हर लम्हा गुज़ारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

वज़नी: heavy; नफ़स: breath; नाख़ुदा: boater, sailer;
ज़ीस्त: life; शीना: shine; क़रीना: style


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उफ़! यह मोहब्बत

“उफ़! यह मोहब्बत भी क्या चीज़ है
कभी बोझल आँखों से ख़ूँ टपकता है
कभी नब्ज़ बुझती है साँस जलती है”

पास मेरे जो तेरी तस्वीर नहीं
हाथों में मेरी तक़दीर नहीं
जिस तरह जी रहा हूँ जानता हूँ
सीने में साँसों की ज़ंजीर नहीं

मेरी राह से दिल से गुज़रती थी
चाँद जैसे रोज़ सँवरती थी
एक तरफ़ा मैं मरता था तुम पे
क्या तुम भी मुझपे मरती थी

वह बारिश, दिन वह मुबारक़
मेरी आँखों में ठहर गया है
दुआओं से भी न लौटे तुम
दिल पे जैसे क़हर बरपा है

मेरे ज़ख़्मों पे नमक रखा है
ज़बाँ से नहीं जिस्म से चख़ा है
गलता है तन्हाई में धीरे-धीरे
एक उम्र से मेरा सखा है

हम जो बिछुड़े हैं मिलेंगे भी
मुरझाये दो चेहरे खिलेंगे भी
चाँदनी रिदा होगी हम होंगे
सिलसिले ख़ाबों के चलेंगे भी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २९ मई २००३

आ तेरी आँखों के नीलम से

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ
पलकों पे रख लूँ कुछ ख़ाब तेरे
अपने कर लूँ…

खोने लगें तो खोने देना
डूब जाना मुझको डबोना
बोझल-बोझल शाम है
मत पूछना क्या नाम है

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ

बढ़ने दे रात की ख़ाहिश
होने दे ख़ाब की बारिश
उलझने दे जितना उलझते जायें
ऐसा उलझें कि सुलझ न पायें

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२