I’m deserted with dreams

I’m deserted with dreams to feel the thirst
And trying to find all your best

I did each n’ every time what you wanted
But baby you were blind to count it

You did all the things well, except one
You couldn’t understand my comprehension

I love you truly more than my life
In this world you’re the one of my type

Here is my longing baby, where are you?
Everyday I’m crying blood to get you

Some uncertain things are to be happen
Baby, If we’re going set ourselves frozen

Please please don’t go away don’t be apart
You are from where myself gets start

I want you to get on to happiness
Without you here I am left breathless

frozen: unfriendly


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

कहीं भी पूरा नहीं था,
मेरे जिस्म पे इश्क़ का चीरा नहीं था
ख़ाली-ख़ाली था सूना-सूना था
दिल मेरा, यह दिल मेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

क़तरा-क़तरा हर एक क़तरा
ज़हन से कोई न उतरा,
मीठे-मीठे ज़हर के प्याले
मैं भी एक उम्र से गुज़रा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

मैंने पहल नहीं की थी
मैं इस सब से परहेज़ रखता हूँ
कितने मीठे होते हैं अय्यार
मैं यह कब चखता हूँ…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

ऐसे अर्श पे कब था डेरा
उगता है जहाँ, चटखा सवेरा
तकलीफ़ तख़लीक़ होती रही
दिल में नहीं होता बसेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

अय्यार= चालाक, clever; अर्श= आसमाँ, sky; तख़लीक़= उद्भव, creation


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

मैंने तेरा नाम नहीं जाना

मैंने तेरा नाम नहीं जाना
जाना तो जाना बस इतना जाना
प्यार में तेरे मैं हो गया दीवाना

पहली नज़र में होश गुम गया
दूसरी नज़र का हाल कैसे बताऊँ
दिल को आना था तुम पर आ गया
भला दिल को मैं कैसे समझाऊँ

पहले चरचे मेरी यारी के होते थे
अब मैं हो गया ख़ुद से बेग़ाना

मैंने तेरा नाम नहीं जाना
जाना तो जाना बस इतना जाना
प्यार में तेरे मैं हो गया दीवाना

आशिक़ी, उल्फ़त, प्यार, मोहब्बत
हमने तो बस यह नाम सुने थे
देखकर तुम्हें जाना लोग सच कहते थे
जो प्यार करता है ख़ुद से डरता है
शीरीं-फ़रहाद कब ज़माने से डरते थे

तेरे हुस्न की कटार दिल पर चली है
मिटकर रहेगा शमअ पर परवाना

मैंने तेरा नाम नहीं जाना
जाना तो जाना बस इतना जाना
प्यार में तेरे मैं हो गया दीवाना

दिल का हाल अजब हो गया है
उसका सितम ग़ज़ब हो गया है
यह इश्क़ अक़ीदत हो चला है
तुमसे प्यार मेरा रब हो गया है

दिल में लहू नहीं तेरा प्यार बहता है
यह दिल है तुम्हें चीरकर दिखलाना

मैंने तेरा नाम नहीं जाना
जाना तो जाना बस इतना जाना
प्यार में तेरे मैं हो गया दीवाना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०३ मई २००३

बिछड़ के रहना सीख लिया है

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…

क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…

हर तरफ़ तू नज़र आती है
पल-पल तू दिल में समाती है
बेवफ़ा तू हो सकती नहीं
दिल से जुदा तू हो सकती नहीं

क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

जो दिल से जाता नहीं है

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

साँसों की सरगम बस तुम ही तुम
लफ़्ज़ों में जब हम बस तुम ही तुम

कहना कितना मुश्किल था
यह समझा न सके
अपने दिल की बात हम
तुम्हें बता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

प्यार क्या है सनम हमें कब पता था
हमें जब तुम मिले तब पता चला था

अकेले रहना मुमकिन नहीं
यह कह न सके
अपने दिल के जज़्बात हम
तुम्हें जता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

अब तो ऐसा लगता है मुझको
जैसे फूलों में ख़ुशबू नहीं है
तुम जो नहीं यहाँ पर सनम
जैसे यहाँ पर कुछ भी नहीं है

बेचैन करती हैं यादें दिन-रात
बुझती नहीं हैं साँसें
हर लम्हा सोचता हूँ क्या मैं
करूँ तो क्या करूँ

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

कुछ और अब बाक़ी नहीं
बस मैं हूँ मेरा ख़ाब है
ख़ामोश रहती हैं यह रातें
बस मैं हूँ मेरा साथ है

ज़िन्दगी मेरी तुम बदलकर चले गये
तन्हा कर गये हमें तन्हा कर गये

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९