ख़ाब में लम्स था सुम्बुल का

ख़स्ताहाल है जो तेरा बीमार
क्यों नहीं हो तुम बेक़रार

तुमने मुझसे बात नहीं की
जला गयी मुझे आहे-शोलाबार

शामे-ग़म मुझे दर्द थे
और तुम आये गोया बहार

पैराहन भीग जाता है लहू से
यूँ बहते हैं दीदाए-फ़िगार

देखना’ न छूना मेरे ज़ख़्म
जला न दे तुझे यह शरार

दाइम मशगूले-हक़ हूँ मैं
फिर भी आश्ना है अग़ियार

कोई हसरत से देखे मुझे
मैं उसे बना लूँ अपना प्यार

तुमसे दोस्ती का बहाना मिले
बन जाओ मेरे ग़मख़्वार

ख़ाब में लम्स था सुम्बुल का
वो क्या लम्हा था यादगार

‘नज़र’ को न भाये कुछ अगर
तो दिल में हो तुम बरक़रार

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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा
कभी तेरी यादों को बिखराया कभी सहेजा

बयाँ दास्ताने-सोज़े-फ़ुगाँ किससे करूँ
सभी मेरे लफ़्ज़ देखते हैं न कि लहजा

सुकूनो-क़रारो-सबात से क्या मुझे
तू इस दिल के सौदे में मेरा सब कुछ ले जा

सदाए-राहे-मुहब्बत बुलाती है मुझको
दिमाग़ कुछ सोच के कहता है ठहर जा

गर्मिए-हौसले-जुनूँ का असर है यह
दिल करता है मुझपे नवाज़िशहाए-बेजा

अब तक न मेरे सलाम का कोई जवाब आया
तूने मुझको कोई ख़त भेजा कि न भेजा

ख़्याले-सुम्बुल से बीमार की बेक़रारी है
ऐ तबीब ‘नज़र’ को इसका इलाज दे जा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५