तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है

तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है
रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है

हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और
तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है

नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ
नज़र उठती है तो ज़िबह2 को यार उठती है

हम देखते हैं तेरे जानिब3 प्यार की नज़र से
तेरी नज़र, उफ़! मानिन्दे-कटार4 उठती है

ग़ैर से तुम को मोहब्बत हुई है बे-वजह
और फिर भी नज़र बाइसे-गुफ़्तार5 उठती है

हैं चमन में और भी नज़ारे ऐ ‘नज़र’ लेकिन
फिर क्यों तेरी नज़र सिम्ते-यार6 उठती है

शब्दार्थ:
1. नाज़ और नख़रे; 2. लड़ाई, क़त्ल; 3. ओर, तरफ़; 4. तलवार की तरह (आवाज़ करती हुई); 5. बात करने के लिए; 6. प्रेयसी की तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल

यह ना जानूँ मैं जानाँ के क़ाबिल हूँ या नहीं
इक अरसे से दौरे-मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ मैं
बाइसे-सोज़े-दिल जो खुला, तुम्हारा तस्व्वुर था
नहीं जानता कि हूँ क्या मगर तेरा प्यार हूँ मैं

दौलते-जहाँ से क्या मिलेगा बिना तेरे मुझको
देख समन्दरे-दर्द को ख़ुद दर्द बेशुमार हूँ मैं
न सहर देखी कोई’ न कोई शाम देखी है मैंने
तेरे बाद सोज़े-दिल से बहुत बेइख़्तियार हूँ मैं

ख़ालिक से हर दुआ में मैंने माँगा है तुझको
मुझे तेरी चाह है तेरे प्यार का तलबगार हूँ मैं
जीता हूँ इस आस पे इक रोज़ मिलूँगा तुमसे
अपने मर्ज़े-दिल का ख़ुद ही ग़म-गुसार हूँ मैं

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल
क्या करूँ जैसा भी हूँ तुझपे जाँ-निसार हूँ मैं
ज़रूर बयाँ करूँगा अपना अरसे-मुहब्बत तुझसे
ना करूँ अगर तो भी कहाँ मानिन्दे-बहार हूँ मै


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४