बच्चों की होम-वर्क डायरी

कुछ रिश्ते होते हैं बच्चों की होम-वर्क डायरी की तरह
हमने ग़म को पहना है दिल पर किसी ज़ेवर की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह

बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

एक दोस्त मेरा भी हो

एक दोस्त मेरा भी हो
एक यार मेरा भी हो
जिसकी बाँहों में मुझे
मिल जाये ज़िन्दगी
जो झूठ-मूठ रूठ के
सताये, करे दिल्लगी

देखे हमने कई हसीं
लेकिन वह मिला नहीं
जो पहली नज़र में
दिल में उतर जाये
जो गहने उतारे गर
तो और सँवर जाये

दिल की दोस्ती के लिए
एक दोस्त मेरा भी हो
एक यार मेरा भी हो

ख़ुशबू हसीनों की मुझे
हमेशा बुलाती रही है
जो अभी देखी नहीं वह
शमअ, जलाती रही है
उसकी सादगी, नयी
सुबह दिखाती रही है

सदा मुस्कुराने के लिए
एक दोस्त मेरा भी हो
एक यार मेरा भी हो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे

तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे
जैसे मेरी सदा तुम्हें
जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं
मैं कैसे चुनावाऊँ उन्हें

मैं बद से बदतर हुआ जाता हूँ
याद कर-करके तुम्हें
ख़िज़ाँ भी ख़ुशरंग हुई जाती है
खुष्क पत्ते पहने-पहने

शाम कितनी हसीन हो जाती है
पहने के रात के गहने
ऐसी शाम भी सादी लगती है मुझे
यह दर्द क्या पता तुम्हें

अब तो खुष्क पत्तों पर
ओस की तरह जीता हूँ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०८ जून २००३