आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल

यह ना जानूँ मैं जानाँ के क़ाबिल हूँ या नहीं
इक अरसे से दौरे-मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ मैं
बाइसे-सोज़े-दिल जो खुला, तुम्हारा तस्व्वुर था
नहीं जानता कि हूँ क्या मगर तेरा प्यार हूँ मैं

दौलते-जहाँ से क्या मिलेगा बिना तेरे मुझको
देख समन्दरे-दर्द को ख़ुद दर्द बेशुमार हूँ मैं
न सहर देखी कोई’ न कोई शाम देखी है मैंने
तेरे बाद सोज़े-दिल से बहुत बेइख़्तियार हूँ मैं

ख़ालिक से हर दुआ में मैंने माँगा है तुझको
मुझे तेरी चाह है तेरे प्यार का तलबगार हूँ मैं
जीता हूँ इस आस पे इक रोज़ मिलूँगा तुमसे
अपने मर्ज़े-दिल का ख़ुद ही ग़म-गुसार हूँ मैं

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल
क्या करूँ जैसा भी हूँ तुझपे जाँ-निसार हूँ मैं
ज़रूर बयाँ करूँगा अपना अरसे-मुहब्बत तुझसे
ना करूँ अगर तो भी कहाँ मानिन्दे-बहार हूँ मै


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

साहिबा ज़ुलेख़ा सोफ़िया

साहिबा ज़ुलेख़ा सोफ़िया आँखों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू

जानाँ मैं तेरे हुस्न का ख़्वार हूँ
तेरी इक झलक को बेक़रार हूँ
तेरे लिए दर-ब-दर भटकता रहा
रात-दिन तेरा नाम रटता रहा

मेरे दिल के अँधेरों में उजालों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू

यूँ ही दूर से देखूँ कब तलक तुझे
अपनी आँखों में बाँहों में छुपा ले मुझे
तेरे प्यार को ज़रा प्यार करने दे
इक़रार करके इज़हार करने दे

ज़हन के तस्व्वुर में सवालों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १२ मई २००३