बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

जब पतझड़ के मौसम आते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले झड़ जाते हैं
जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले गिर जाते हैं
पत्ते वह फिर से वापस आते हैं
पेड़ों पर फिर से वापस आते हैं
फूलों के गुच्छे हवा में लहराते हैं
आते-आते दिल क़रीब आते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

परवाने शमअ पर मर मिटते हैं
आशिक़ ऐसे कहाँ कब मिलते हैं
दीवाने शमअ पर मर मिटते हैं
साहिब, ऐसे कहाँ अब मिलते हैं
होते हैं उजाले मिटते जाते अँधेरे
दो दिल मिल जायें होते हैं सवेरे
दिए जलते हैं व गुल खिलते हैं
लम्हे रुकते हैं, ख़्याल बहते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९