ज़िन्दगी धूल की तरह

ज़िंदगी धूल की तरह – हर मोड़ हर रहगुज़र से गुज़रते हुए – कभी दर्द की धूप में – कभी आँसुओं की रिमझिम में – भीगते बहते हुए बीत रही है – ख़ुशी की सहर और शाद की शाम मैंने तुम्हारे साथ देखी थी – फिर दोबारा आज तक देखी नहीं… हाँ जुदाई का एक क़लक़ -एक हैफ़… हनोज़ दिल में बाक़ी है… और दम-ब-दम दर्द को ईंधन झोंक रहा है… आँखों से वक़्त ने सब आँसू भी सोख लिये हैं… अब आँखें उदास… लब तिश्ना… दिल बेज़ार… ख़याल सूखे हुए… बेजान-से हैं। कोई उम्मीद बर नहीं आती… कोई राह नज़र नहीं आती… कोई चराग़ राहों में नहीं जलता… कोई दोस्त… कोई हम नफ़स… कोई ग़मग़ुसार… अब आस-पास नहीं है मेरे। चंद बेचैनियाँ… कुछ बेक़रारियाँ… कुछ भारी साँसें नफ़स का तार-तार तोड़ रही हैं। ज़ीस्त से दिलचस्पियाँ… जान से सब लगाव ख़त्म हो चुके हैं… बस किसी तरह इस बदन को ढो रहा हूँ। दिलासों की कोई आहट… साथ का कोई हाथ… अब मेरे दिल पर नहीं है…तुम बिन ज़िंदगी सफ़र तो कर रही है… मगर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। बेमंज़िल ये सफ़र मानिंदे-सिफ़र लगता है… जहाँ से चलना शुरु करता हूँ वहीं आकर रुक जाता हूँ और आख़िरश वहीं आकर रुक जाता हूँ…क्योंकि मेरी मंज़िल सिर्फ़ तुम हो… और रह-रहकर हमेशा तुम ही मेरे तस्व्वुर को सजाती हो… रंगती हो… महकाती हो… इक नयी राह दिखाती हो… मगर फिर भी… तुम नहीं, तुम नहीं तो… यह सब एहसास बेमानी लगते हैं… तेरी कमी मेरे साथ-साथ परछाइयों की तरह चलती है और जब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ… तो किसी हमदर्द दुश्मन की तरह लगती है…

तुम बिन मेरा जीना कितना मुश्किल है… कभी तुम यह ख़त पढ़ो तो तुम्हें ये ख़ुद-ब-ख़ुद समझ आये।

It was for SK

 

 

 

मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी

मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी
जो दुआ में तू मुझे माँग पाये कभी

टूट चुके हैं मेरी तमन्ना के दोश
तू ख़ुद संभाला देने को आये कभी

कबसे गया है न आया आज तक
मेरी आरज़ू तुझे खींच लाये कभी

ख़ुदाया मैं भटक रहा हूँ सहराँ में
कोई इस तस्कीं को मिटाये कभी

ग़मगीन शाम है और उदास हम
क्यों गुफ़्तगू का मौक़ा आये कभी

हमसे उल्फ़त किये बनती नहीं
मोहब्बत राहे-जुस्तजू पाये कभी

ख़स्ता हाल है दिल बहुत तेरे लिए
तुझे मजमूँ यह समझ आये कभी

तस्वीर मुझसे बात करती नहीं
तेरा यह दीवाना सुकून पाये कभी

तेरी कशिश भरी एक नज़र इधर
दिल पर अपना जादू चलाये कभी

तुम न जानो मेरे प्यार के बारे में
और ख़ुशबू तेरा पयाम लाये कभी

पहली नज़र से जो हसरत है मुझे
काश ख़ूबरू उसे समझ पाये कभी

दोश : कंधा, shoulder | मजमूँ : विषय, subject | ख़ूबरू : सुन्दर चेहरे वाला, beautiful


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

काश यह सन्दली शाम महक जाती

काश यह सन्दली शाम महक जाती
सबा* तेरी ख़ुशबू वाले ख़त लाती

तुझसे इक़रार का बहाना जो मिलता
मेरी क़िस्मत शायद सँवर जाती

दीप आरज़ू का जलता है मेरे लहू से
काश तू इश्क़ बनके मुझे बुलाती

दूरियाँ दिल का ज़ख़्म बनने लगीं हैं
होता यह नज़दीकियों में बदल जाती

सबा: ताज़ा हवा, breeze


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उसका सूरज जलते-जलते राख़ हो गया

उसका सूरज जलते-जलते राख़ हो गया
मेरा चाँद पिघलते-पिघलते पिघल गया
ना उस दिन उसके दिल से उफ़ आयी
ना आज तक मेरे दिल से आह निकली

मेरे पास उसकी दी हुई हर एक चीज़ है
जो न उसने मुझसे बेतरह माँगी कभी
न उसने कुछ कहा ही ख़त के ज़रिए
और न मैंने ही यह नब्ज़ बाँधी कभी

वह लबों को सीं कर
बैठा रहता है मेरे पास ही
उससे मेरी इक शर्त है
जो न मैंने तोड़ी
और न उसने तोड़ी कभी
वह नयी शाख़ पर पहला फूल था
ज़िन्दगी का एक उम्दा उसूल था
क़ुबूल किया था मैंने उसको
अपना हाथ देकर
पर मैं न उसको कभी क़ुबूल था

ज़िन्दगी के रंग आँखों की नमी ने सोख लिए
मैं फिरता रहा हमेशा ही उसकी याद लिए
मालूम नहीं वह ख़ाब था या कोई रंग था
मेरे जिस्म का मोम जलता रहा फ़रियाद लिए

वह आया था मेरी ज़िन्दगी में
सूरज की पहली किरन जैसे
वह फिरता था दिल के बाग़ीचे में
इक चंचल हिरन जैसे
उसके लबों से उड़ती थी
तितलियाँ हँसी बनकर
अब वह बैठा रहता है
अपने माथे पर शिकन लिए
इक बार फिर वहीं आ गये
जहाँ से चले थे पहले कभी-

उसका सूरज जलते-जलते राख़ हो गया
मेरा चाँद पिघलते-पिघलते पिघल गया
ना उस दिन उसके दिल से उफ़ आयी
ना आज तक मेरे दिल से आह निकली


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

उम्मीद है हम तुम मिलेंगे

उम्मीद है हम तुम मिलेंगे
उम्मीद है नये दीप जलेंगे
जब बसंत की धूप महकेगी
उम्मीद है दोनों दिल खिलेंगे

उम्मीद है ख़ुशी घर आयेगी
उम्मीद है तेरा ख़त लायेगी
जब कली से भँवरा मिलेगा
उम्मीद है ख़ुशबू बुलायेगी

उम्मीद है बादल बरसेंगे
उम्मीद है दो दिल तरसेंगे
जब रिमझिम से मन भीगेगा
उम्मीद है बदन महकेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४