Am I untrue?

Without you’ I am dying
My heart is crying’ baby
That’s love, drenched in wine

Unfold the truths’ unfold the lies’
There’s no flowers’ no fragrance
No leaves’ no butterflies

Sheer madness haunts me
For you, what I want to be
My pain, my sore, can’t you see?

Without you’ I am dying
My heart is crying’ baby
That’s love, but not divine

Want to touch you to love you
Anything rest to express you
Look at me, am I untrue?

Unfold the truths’ unfold the lies’
There’s no flowers’ no fragrance
No leaves’ no butterflies

Ease my troubles with smiles
Come closer to hold me
We’re apart by million miles


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
यह कि झूठ को सच मतलब को मन जाना

वहम की धूल जब गिरी पलकों से
हमने सच और झूठ का सारा फ़न जाना

आँखों से आपकी तस्वीर उतारी न गयी
हमने शबो-रोज़ चाँद को रोशन जाना

जिस्म ख़ाहिशमंद था रूह सुलगती थी
हमने बुझते बादलों को सावन जाना

हम भी शाइरी के फ़न सीखने लगे ‘नज़र’
जबसे जन्नतो-जहन्नुम का चलन जाना

फ़िराक़= separetion, अजल=death, fate, विसाल=meeting


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जैसे-तैसे निभाते हैं

जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं
सच्चे-झूठे सपने तेरे
रातों की नींदें उड़ाते हैं

दो किनारे जिससे मिलते हैं
वह पुल टूट गया
बारिश बाढ़ बनी कि फिर
हाथों से हाथ छूट गया

उम्मीदें क्यों रखते हैं
जो अब रोये जाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं

रुसवाई कुछ और नहीं
एक झूठा बहाना है
क्यों करते हो वादे जिनको
बेमानी हो जाना है

कैसे-कैसे लोग यहाँ
जो बस अपनी सुनाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है

मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना है
बाक़ी सब झूठ है यह सच्चा सपना है

कल तक लबों पर उसके लिए दुआ थी
आज दुआ में थोड़ा कुछ हिस्सा अपना है

मैं आज चली हूँ नयी मंज़िल की तरफ़
आज मेरी आँखों में एक नया सपना है

बीते हुए लम्हों को कैसे भूलेगा कोई
उसमें तो एक अधूरा रिश्ता अपना  है

जादू का खेल है महब्बत कैसे बचते
क्या करें अब यह टूटा हुआ सपना है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३