मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ

मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
ज़िन्दगी के इस पुराने करघे पर
कि मैंने कभी सूत भी काता है
रिश्तों के इस टूटे हुए चरख़े पर

आँखें वीरान हैं दूर तक रेत ही रेत है
पानी का कहीं नामो-निशाँ नहीं है
सूरज भी उसकी मुस्कुराहट का ना आया, वो कहाँ है?
मेरी हर रात सूखकर बंजर हो गयी है

मोहब्बत मेरी अफ़साना बन गयी है
मैं रह गया हूँ इक किरदार बनकर…

बेजान यह जिस्म उघड़ने लगा है
रूह पर से सर्प की खाल की तरह
और यह मेरी रूह भी जल रही है
धधकती ख़ुशरंग आग की तरह

वह मुझे मिला था पिछली शामों को, हसीं चाँद जैसे!
उसने भी गुनाह किया है चुप रहकर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

इस पुराने शहर में

इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

दूर से पत्थर दिखता होगा
बेजान दिल मेरा लगता होगा
छूकर देखो,
दीवारें आज भी साँस लेती हैं
न कहती हैं न सुनती हैं
टूटती-गिरती हैं…

जब भी गुज़रता हूँ
साये मुझको पुकारते हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

कितने ख़ाबों के बादल बरसे
कितनी ख़ुशबू की बेले महकीं
हर बार,
नशेमन जलकर खाक हुआ
चिन्गारियाँ,
दिलों में जब-जब दहकीं…

जो भीगकर मिटती हैं
कुछ ऐसी भी इबारतें हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३

ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद

कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद
हुए तेरी हसरत में मुए तेरे जाने के बाद

सोहबत किसी दोस्त की रास न आयी हमें
अजनबी से दोस्तों में रहे तेरे जाने के बाद

जब भी पहलू में किसी के यार को देखा हमने
ख़ाहिश तेरी करते रहे तेरे जाने के बाद

दिल का हर टुकड़ा हर एक साँस पे रोता है
हम उसके आँसू पोंछा किये  तेरे जाने के बाद

तुम मिल जाओ अगर ज़ीस्त मिल जाये हमें
जिस्म अपना बचाते रहे तेरे जाने के बाद

उज्र हमको नहीं था तुमसे बात करने को
फिर भी नज़्म लिखते रहे तेरे जाने के बाद

तुमसे जो मरासिम है हमारा वो इश्क़ ही है
हम जी से इसे निभाते रहे तेरे जाने के बाद

फ़िराक़ ने साँसों में इक गाँठ लगा दी है सनम
जतन ढेर छुटाने को किये तेरे जाने के बाद

दर्द और तन्हाई के निश्तर चुभते हैं
हम मान्निद दीवाने हुए तेरे जाने के बाद

तमाशा गरचे अपनी मौत का किसने देखा है
नज़’अ में साँस भरते रहे तेरे जाने के बाद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन

मैं ईज़ा1 में पड़ा नदामत2 को तड़पता रहा
जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा

मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में
और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा

जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं
वैसे वो सारा दिन बर्क़-सा कड़कता रहा

तुमने जिसे बेजान समझ के ठुकरा दिया
वो दिल तेरे बाद तेरे नाम से धड़कता रहा

वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन, पर’
फिर भी वो लम्हा आँख-सा फड़कता रहा

1. कष्ट या दु:ख; 2. पश्चाताप


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५