पल भर को सही मेरे ज़ख़्मों को बुझाने के लिए आ

पल भर को सही मेरे ज़ख़्मों को बुझाने के लिए आ
आ तू कभी मुझको मोहब्बत सिखाने के लिए आ

पहले प्यार का रंग दिल पे बहुत गहरा चढ़ा है
तू कभी इस रंग में अपना रंग मिलाने के लिए आ

मेरी तरह तेरे दिल में भी होंगी कुछ बेइख़्तियारियाँ
इस इश्क़ के तूफ़ाँ में तू मुझको डुबाने के लिए आ

जितनी शिद्दत से मैंने तुझको रात-दिन चाहा है
उस तरह तू बाक़ी के दिन-रात महकाने के लिए आ

बे-मौत शबो-रोज़ मरता हूँ मैं तड़प-तड़प कर
तू कभी मुझको ज़िन्दगी के हुस्न दिखाने के लिए आ

मुझको क्या हासिल है तेरे प्यार में सिवाय फ़ुर्क़त
तू यह फ़ु्र्क़त की बद्-रंग शाम मिटाने के लिए आ

मुझमें हर तरह क़हर नाज़िल हैं बद्-नसीबियों के
तू कभी मेरी तक़दीर की शम्अ जलाने के लिए आ

जो तुझको बिना बताये छोड़कर चला गया है ‘नज़र’
उसको क़सम दे, कह कि तू कभी न जाने के लिए आ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह

बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तुमने हमसे हमको चुराया

तुमने हमसे हमको चुराया
दिल में अपने हमको बसाया
हम कुछ दीवाने हो गये हैं
हाँ, दूर ख़ुद से हो गये हैं
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम

यह उड़ते बादल घिर जायें
बिजली ज़रा कड़क जाये
तू मेरी बाँहों में आकर के
मेरे सीने से सिमट जाये

यह बादल क्यूँ घिर आयें
और बिजली क्यूँ गिर जाये
हम तेरे ही तो हैं आख़िर
आके ख़ुद ही लिपट जायें

यह सच भी सच कर दो
दिल में है जो कुछ कर दो
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम

क्यूँ इस तरह मुस्कुराती हो
क्यूँ तुम मुझसे शरमाती हो
क्यूँ एक झलक देकर कहीं
आँखों से ओझल हो जाती हो

हम सामने जो आ जायें
दिल बेक़ाबू न हो जाये
इश्क़ में यह डर है हमको
हमसे भूल न हो जाये…

दिल को बेक़ाबू हो जाने दो
यह भूल भी हो जाने दो
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

धुँधलियाँ

धुँधलियाँ-धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ

अहसास हो क़रीबी का
मिज़ाज हो ख़ुशनसीबी का
बदले हैं रंग फ़िज़ाओं ने
नूर हो माह रकाबी का

धुँधलियाँ धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

बिजलियाँ बिजलियाँ
तेरे रूप की बिजलियाँ

जिस्म रेशमी आग का
चिकने मखमली आफ़ताब का
ख़ुशरू पे बैठी हैं मुस्कियाँ
उतरा है रंग हिजाब का

धुँधलियाँ धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ

भूल गया सारी मजबूरियाँ
दूर हो गयीं सब दूरियाँ

तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मेरी आँखों पर जो था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था
मुहब्बत के ज़हरीले तीर जो तुमने चलाये
तिश्ना लबों पर प्यास का क़तरा कितना बेकल था

वह गीले गुलाबी लब तेरे कितने नशीले थे
तेरी नख़्वत से हाए! हुए कितने रोबीले थे
देखा तो देखता ही रह गया तेरे यह आशिक़
तेरा चेहरा झील में खिलता हुआ ताज़ा कँवल था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था

जब भी निकलती हो सामने से मुस्कुराके निकलती हो
क्यों न हो दर्द मीठा-मीठा बर्क़ गिराती चलती हो
तुमको कोई और चाहता है मेरी चाहत हुई बेअसर
मेरे दर्दो-दिल का हर टुकड़ा एक नयी ग़ज़ल था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था

तिश्ना= प्यासा, नख़्वत= नखरा, नाराज़गी, बर्क़= बिजली


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००२