जो ख़ता की न उसकी सज़ा दी गयी

जो ख़ता की न उसकी सज़ा दी गयी
कौन जाने क्यों कश्ती डुबा दी गयी
jo kh.ataa kii na uskii sazaa dii gayii
kaun jaane kyu’n kashtii dubaa dii gayii
19:58 26-08-2013

छीन कर प्यार मेरा ‘ ठहाके लगे…
और तन्हाई की बद्‌-दुआ दी गयी
chheen’kar pyaar meraa ‘ Thahaake lage…
aur tan’haa’ii kii bad’duaa dii gayii
20:31 26-08-2013

जो हुआ सो हुआ ‘ ये नयी रस्म है
ये जता कर ‘ पुरानी भुला दी गयी
jo huaa so huaa ‘ ye nayii rasm hai
ye jataakar ‘ puraanii bhulaa dii gayii
20:40 26-08-2013

चल पड़े हैं सफ़र पे मुसाफ़िर अश्क
सो गयी थी सुबह फिर जगा दी गयी
chal paRe hain safar pe musafir ashk
so gayii thii subah phir jagaa dii gayii
21:08 26-08-2013

आइना रो पड़ा है तेरी याद में
और मुझको भी थोड़ी पिला दी गयी
aa’inaa ro paRa hai terii yaad mein
aur mujh’ko bhii thoRii pilaa dii gayii
21:16 26-08-2013

वहम से हारना अब मुनासिब नहीं
हर बुझे दीप में लौ लगा दी गयी
wahem se haar’naa ab munaasib nahii’n
har bujhe deep mein lau lagaa dii gayii
22:07 26-08-2013

दर्द देगी जफ़ा उसकी’ बेहद मुझे
सो मुझे बेवफ़ाई सिखा दी गयी
dard degii jafaa us’kii behad mujhe
so mujhe bewafaa’ii sikhaa dii gayii
22:22 26-08-2013

वो मेरे शहर में ‘ अब नहीं है ‘नज़र’
क्यों मुझे आज ‘ ये इत्तिला दी गयी
wp mere shaher mein ab nahii’n hai ‘Nazar’
kyo’n mujhe aaj ye ittilaa dii gayii
21:37 26-08-2013

212 212 212 212
बहर-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम

___
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
वर्ष: 22:22 26-08-2013

Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 22:22 26-08-2013

रातभर चाँद देखा किये

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये
रातभर चाँद देखा किये

कभी हाथ से ढका चाँद को
कभी बादलों से उठाया भी
गदेली पर रखकर उसे
कभी होंटों तक लाया भी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सितारे टूटते बुझते रहे
उनसे तुम्हें माँगते रहे
ख़ाली था ख़ामोश था लम्हा
हम तेरा नाम लिखते रहे

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

रूह बर्फ़ में जलने लगी
साँस-साँस पिघलने लगी
तेरी तस्वीर देखकर
तन्हाई मसलने लगी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सन्नाटों में बहता रहा
ख़ामोशी से कहता रहा
तुम कहाँ अब कैसी हो
मैं कोहरे सहता रहा

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं

तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

वह पहली शाम जब देखा था तुम्हें
मैं आज तक भूला नहीं हूँ
वह पहली झलक’ वह पहली हँसी
मैं आज तक भूला नहीं हूँ

दूर होकर भी हम-दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

तुम जो आती थी’ तुम जो जाती थी
जैसे उड़ते बादलों में चाँद छिपता है
आती है बहुत तेरी याद मुझे
जब उड़ते बादलों में चाँद छिपता है

उलझे हुए दोनों के जज़्बात हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

तुम याद आती हो मुझे इस तरह
मैं ख़ुद को भी भूल गया हूँ
तेरे सपनों में खोया हूँ आठों पहर
सारा ज़माना भूल गया हूँ

दो अन्जान मुसाफ़िर जो साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
शाख़ों पर हैं नयी कोंपलें
जब से मौसमे-फ़ुर्क़त गुज़रा है

पुरवाइयाँ तन-बदन पे आग लगती हैं
तन्हाइयाँ मेरे ज़हन से ख़ौफ़ रखती हैं
निगाह में तस्वीरे-यार सजा ली जब से
रंगीनियाँ दिल को ख़ुशगँवार लगती हैं…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
बेलों पर महके गुच्छे
जब से हुआ यह मौसम हरा है

मेरी बेक़रारियाँ आज क़रार पाने लगी हैं
यह धड़कनें तेरा नाम गुनगुनाने लगी हैं
इक अजब भँवर-सा उमड़ा है ख़्यालों का
ख़ाबों ख़्यालों की भीड़ राह पाने लगी है…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
पैमाने सारे भर गये हैं
बादाख़ार हुआ यह दिल ज़रा है

सूरज है हुस्न उसका, जलाता है मुझको
बदन रेशमी चाँद जैसा, लुभाता है मुझको
तक़दीर जो उसने ‘ जोड़ ली है मुझसे
आज मौसम बहार का, बुलाता है मुझको…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
मेरे लिए उसकी चाहत
आज तो उसका दिल भी ख़रा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

बिछड़ के रहना सीख लिया है

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…

क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…

हर तरफ़ तू नज़र आती है
पल-पल तू दिल में समाती है
बेवफ़ा तू हो सकती नहीं
दिल से जुदा तू हो सकती नहीं

क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं

बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९