Am I untrue?

Without you’ I am dying
My heart is crying’ baby
That’s love, drenched in wine

Unfold the truths’ unfold the lies’
There’s no flowers’ no fragrance
No leaves’ no butterflies

Sheer madness haunts me
For you, what I want to be
My pain, my sore, can’t you see?

Without you’ I am dying
My heart is crying’ baby
That’s love, but not divine

Want to touch you to love you
Anything rest to express you
Look at me, am I untrue?

Unfold the truths’ unfold the lies’
There’s no flowers’ no fragrance
No leaves’ no butterflies

Ease my troubles with smiles
Come closer to hold me
We’re apart by million miles


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

तुम गर हो सीना मुझको बना लो धड़कन

तुम गर हो सीना मुझ को बना लो धड़कन
आतिश बहे नस-नस में मिटे शीत की कम्पन

जिस सूरत पे दिल आ गया उसपे निसार है सब
मेरी यह उम्र, यह जान, यह यौवन

रंग-बिरंगे फूल खिले ख़ुशबू बिखरी हर-सू
मन की तितली फिरती है गुलशन-गुलशन

प्यार का जादू अब हम समझे क्या होता है
हम-तुम दोनों जैसे पानी और चन्दन

अब्रे-मेहरबाँ एक फ़साना रहा मुझको
चन्द्रमा खो गया जिसमें मेरी बढ़ा के लगन

वादा-ए-निबाह न किये फिर भी टूटे मुझसे
है नसीब मुझको बिन चाँद यह स्याह गगन

तेरी नज़र ने ज़िबह किया बारहा मुझको
रहा ताउम्र मुझ पर तेरा ही पागलपन

‘नज़र’ तेरी मेहर को बैठा है आज तलक
मरासिम बना के मुझसे जोड़ लो यह बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तू जाके फिर ना आयी

तू जाके फिर ना आयी
मगर बार-बार आती रही तेरी याद
सबने सुनी कहानी मेरी
पर ना सुनी गयी मेरी फ़रियाद

मैं भूला नहीं तेरा चेहरा कभी
यह पागलपन है मेरा कहते रहे सभी
तेरे सपने आँखों में लेकर
मैं साथ तेरे जीता रहा तेरे बाद

तू जाके फिर ना आयी
मगर बार-बार आती रही तेरी याद

वो उजले सवेरे वो सुनहरी शामें
मैं ढूँढ़ता रहा हूँ ले-लेके तेरे नाम
आँखें राहों पर बिछाये अपनी
मैं तेरी तलाश में निकला तेरे बाद

तू जाके फिर ना आयी
मगर बार-बार आती रही तेरी याद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मुझे इक जुनूँ है तेरी मोहब्बत का

मुझको इक जुनूँ है तेरी मोहब्बत का
कि डर नहीं मुझे किसी की नफ़रत का

दिल में दर्द की आग है, चिंगारी है
तेरी ही बे-इन्तिहाँ चाहत है ख़ुमारी है

तुझे देखता रहूँ मैं तुझे ही चाहता रहूँ
कि इन्तिज़ार है मुझे तेरी सोहबत का

मुझे बाँहों का आशियाँ दे आवारा हूँ
बे-दर्द तू कभी आवाज़ दे तुम्हारा हूँ

बता कैसे जियूँ इस सूरज की तरह
मुझे चाँद बना ले अपनी जन्नत का


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

सिफ़र को टोह लेते हैं दिले-यार में

सिफ़र को टोह लेते हैं दिले-यार में
अपनी भी दीवानगी कुछ कम नहीं

मैं और वह, दोनों कभी दोस्त थे!

सिफ़र= शून्य, zero


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३