जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं
चाहने वाले बाज़ार में बिकते नहीं हैं

ख़ुद से पराया ग़ैरों से अपना रहे जो
ऐसे लोग एक दिल में टिकते नहीं हैं

सूरत से जो सीरत को छिपाये फिरते हैं
वो कभी सादा चेहरों में दिखते नहीं हैं

होता है नुमाया दिल को दिल से, दोस्त!
मन के भेद परदों में छिपते नहीं हैं

इन्साँ है वह जो जाने इन्सानियत
हैवान कभी निक़ाबों में छिपते नहीं हैं

वक़्त में दब जाती हैं कही-सुनी बातें
हम कभी कुछ दिल में रखते नहीं हैं

पलटते हैं जो कभी माज़ी के पन्नों को
ये आँसू तेरी याद में रुकते नहीं हैं

नहीं मरना आसाँ तो जीना भी आसाँ नहीं
चाहकर मिटने वाले मिटते नहीं हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा

मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा
वह शामो-सहर ढूँढ़ता फिरा

जिस बाज़ार में ग़म बिकते हों
उसे दिनो-दोपहर ढूँढ़ता फिरा

आस एक बुझी-बुझी है दिल में
मैं हर गली शरर ढूँढ़ता फिरा

कोई खोदे वह यहीं दफ़्न है
‘नज़र’ जिसे बेख़बर ढूँढ़ता फिरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३ 

इस जानिब य उस जानिब

इस जानिब य उस जानिब
कौन ‘नज़र’ है कौन ‘ग़ालिब’

एक बला है दर्दे-निहाँ
कौन बुरा कौन भला साहिब

यह मंडी भी ख़ूब है जिसमें
दाम नहीं देता कोई वाजिब

दिन को जी भर सो लिये
हुए रात ख़ाबों से मुख़ातिब

ज़ख़्म सीने पर पोंछ लिये
थी उसे चुपचाप मुनासिब

दर्दे-निहाँ= छुपा हुआ दर्द, unsaid pain


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३