दर्द को दर्द का मरहम दे दे

दर्द को दर्द का मरहम दे दे
ऐ मौत न आने की क़सम दे दे

लगन यार की मन से जाये ना
दिल की तड़प काम आये ना
नहीं आता तो आने का वहम दे दे

मैं बिखर गया तेरे जाने के बाद
जाना प्यार तुझे खोने के बाद
मिलने का कोई वादा सनम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…

मसला मुझे विरह की रातों ने
तोड़ा-जोड़ा मुझे बीती बातों ने
मेरी रूह को चैन हमदम दे दे

यह ख़ुमार अब आठों पहर है
ज़िन्दगी जैसे कोई ज़हर है
मुझको वही ख़ुशी का मौसम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़ुशबू के आइने ने

ख़ुशबू के आइने ने
मेरे चेहरे पर धूप बिछा दी
जो बात भूल गया था
एक बार फिर याद करा दी

वक़्त ने आवाज़ दी
ऐ ज़िन्दगी आज फिर हैराँ हूँ
कल तक मैं क्या था
सोचो तो आज मैं कहाँ हूँ

सूखे हुए लफ़्ज़ हैं
अब नज़्म की बात क्या होगी
बहार के पुरज़ों ने
अब ज़र्द ख़िज़ाँ को विदा दी

तेरा रेशमी उजला
आइने-सा रुख़ न भूल पाऊँगा
मैं गुज़र रहा हूँ
पर बीती गली न लौट पाऊँगा

अब्र गुज़रे सहरा से
वक़्त की रेत उसने भिगा दी
शज़र की प्यास बुझे
किसने उसको मिराज़ दिखा दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

एक लड़की

एक लड़की मुझको सारा दिन परेशाँ किये घूमती है
ख़ाबों में भी आयी ख़्यालों को हैराँ किये रहती है

उसकी बातों में जाने कैसी ख़ुशबू है नाज़ुक मिज़ाज की
अदाए-हरकत है कभी गुल तो कभी मिराज़ की

यूँ तो इस जा में मेरी शख़्सियत है खाकसार-सी
लफ़्ज़ यूँ बुनती है’ जैसे हूँ तबीयत ख़ाबे-ख़ुमार की

चाहती क्या है, बात क्या है, मैं पता करूँ तो कैसे?
दर्दो-ग़म की बात छोड़, दिल का भेद तो कह दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है
ज़ख़्म मवाद है आँख मेरी बेआब है

क्यूँ इश्क़ ख़ौफ़ खा रहा है हिज्र से
नस-नस में मेरी कोई ज़हराब है

सुलगते हैं तेरे ख़्याल शबो-रोज़
गलता हुआ तेज़ाब में हर ख़ाब है

जुज़ बद्र कौन मेरा रक़ीब जहाँ में
मेरी ख़ाहिश को लाज़िम कैसा नक़ाब है

भटकती है नज़र किसकी राह में
उल्फ़त को मेरी क्या-क्या हिसाब है

ज़िन्दगी कब शक़ खाती है मौत से
मौत को भी ज़िन्दगी से क्या हिजाब है

हर्फ़ मेरे और तसलीम नहीं देते
कि ‘नज़र’ को दर्द से क्या इताब है

सराब= मरीचिका, Mirage, बेआब= सूखी, ज़हराब= ज़हरीला पानी, जुज़= केवल
बद्र= पूरा चाँद, रक़ीब= दुश्मन, हिजाब=पर्दा, शर्म, इताब= गुस्सा, Rebuke


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३