How far we are

How far we are
How close we would be
Eyes are filled with mist
How clear could be

Drizzle is damping my mind
I’m floating in wet wind
But don’t seek sympathy

Eyes are filled with mist
How clear could be

Moon is at the edge of eve
Not a thread reamins to weave
To everything I’m ready

Eyes are filled with mist
How clear could be

Vivid eyes are getting dim
not because of any whim
Sores are again gory

Eyes are filled with mist
How clear cold be

Tender heart is feeling ill
Hoping for the last will
Where’s the majesty

How far we are
How close we would be
Eyes are filled with mist
How clear could be


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं सबसे बुरा था

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा
मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

उसने मुझको सदा ख़ुशबू के
इक बादल के पार देखा
और मैं चाह कर भी कभी
उसको इस तरह न देखूँगा

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

आईने उसकी आँखों के
मुझको ढूँढ़ते रहे, जाने क्यों?
और मैं अक्स उन आईनों का
कभी भी न बनूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

इक मतलब ही तो है
मुझसे जुड़ता हर नया रिश्ता
और मैं ऐसे रिश्तों से कभी
कोई जज़्बात न रखूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

हर शै पर हुक़ूमत करना
मेरी सबसे बुरी आदत है
और मैं अपनी यह आदत
जानकर भी न बदलूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा

अच्छा या बुरा जो भी समझो
यह तुम्हारी अपनी सोच है
और मैं किसी के लिए
ख़ुद को कभी न बदलूँगा…

मैं सबसे बुरा था
सबसे बुरा हूँ
सबसे बुरा ही रहूँगा

वह किसी ग़ैर के पास जाता है
तो चला जाये, बेपरवाह!
और मैं उसके बेवफ़ा रुख़ का
कभी अफ़सोस न करूँगा…

मैं जी रहा था
जी रहा हूँ
ऐसे ही जीता रहूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

इक चाँद है आसमाँ में

इक चाँद है आसमाँ में रोशन-रोशन
दिल में है हर पल इक तड़पन
सुन रहा हूँ दीवाने दिल की धड़कन

चाँद जो वह आसमाँ पर है
ख़ाब जो वह ज़मीं पर है
उसकी रोशनी फैली है हर कहीं
लेकिन नज़र में तुम नहीं

तेरी झलक पर यूँ कोहरे क्यों छा गये
तुम नहीं जब तो यह गुल मुरझा गये

इक चाँद है आसमाँ में रोशन-रोशन
दिल में है हर पल इक तड़पन
सुन रहा हूँ दीवाने दिल की धड़कन

नग़मा जो वह ज़ुबाँ पर है
कलमा जो वह दिलो-जाँ पर है
बेवफ़ा, सुनो मेरे दिल की सदा
तेरे लिए ही है मेरी वफ़ा

तुमसे ही मेरा जहाँ, तुम मेरी हमनवाँ
एतबार मेरा कर ले मुझे बाँहों में भर ले

इक चाँद है आसमाँ में रोशन-रोशन
दिल में है हर पल इक तड़पन
सुन रहा हूँ दीवाने दिल की धड़कन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

दिल की बस्तियाँ जलीं

दिल की बस्तियाँ जलीं पर उठा नहीं धुँआ
बुझाया आँखों से मैंने पर बुझा नहीं धुँआ

बहुत देर तक टीस दबाये बैठा रहा मैं
चंद अश्क जो आये फिर चुभा नहीं धुँआ

दर्द पर्त-दर-पर्त जमता ही रहा
बुझाया बहुत मैंने पर हुआ नहीं धुँआ

कुछ उम्मीदें अश्कों के साथ बह गयीं
अश्क जो आँखों में आये फिर रहा नहीं धुँआ

पलकें बंद करता था पर होती न थीं
बहुत बाँधा किनारों से पर बँधा नहीं धुँआ

हम क्या-क्या कहें ‘नज़र’ तुम ही कह दो
मैंने आँखों में छुपाया पर छुपा नहीं धुँआ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १७ अगस्त २००४