Still believe in love

I’m walking on the misty road
but still have faith in your love
this seems warm as the rising sun
this is splendid as the full moon

Still believe in love
I still believe in love

Baby you hurt me with your ego
but I still believe in your love
this is only truth second to lies
this is a spell webbed on our eyes

Still believe in love
I still believe in love

I am ruined down on my knees
can you give hands to hold me?
don’t let me be like the season
this pencil work can’t be undone

Still believe in love
I still believe in love

Give me smiles take my gentle kiss
my heart’s beating for your wish
don’t make me feeling deserted
you’re object of desire not hatred

Still believe in love
I still believe in love

I’m addicted to the daily dose
sometimes too far or too close
like a river flowing to the ocean
forget about nature I’m human

Still believe in love
I still believe in love


words: vinay prajapati
concept: 2003
penned: 2008

धुँधलियाँ

धुँधलियाँ-धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ

अहसास हो क़रीबी का
मिज़ाज हो ख़ुशनसीबी का
बदले हैं रंग फ़िज़ाओं ने
नूर हो माह रकाबी का

धुँधलियाँ धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

बिजलियाँ बिजलियाँ
तेरे रूप की बिजलियाँ

जिस्म रेशमी आग का
चिकने मखमली आफ़ताब का
ख़ुशरू पे बैठी हैं मुस्कियाँ
उतरा है रंग हिजाब का

धुँधलियाँ धुँधलियाँ
तेरी यादों की धुँधलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ

भूल गया सारी मजबूरियाँ
दूर हो गयीं सब दूरियाँ

तब्दीलियाँ तब्दीलियाँ
मुझमें इतनी तब्दीलियाँ
छायी हैं ज़हन पर
तेरी बातों की बदलियाँ

नज़दीकियाँ नज़दीकियाँ
तेरी मुझसे नज़दीकियाँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

बातों ही बातों में कोई बात हो

बातों ही बातों में कोई बात हो
दिल से दिल की मुलाक़ात हो
नज़रों से नज़रें कहें कुछ
इनायत-ओ-इल्तफ़ात हो

आज की रात जो चाँदनी है
यह तेरे रूप की रोशनी है
संदली यह बदन तेरा
मुक़द्दस-ओ-कायनात हो

हैं झीलें दोनों आँखें तुम्हारी
सादा-सादा हैं प्यारी-प्यारी
हुईं काजल से ख़ुशरंग यूँ
जैसे सूरज ढले तो रात हो

बख़्त है सबा तुमको छुए
तेरी ज़ुल्फ़ से खेले, मचले
ख़ुशबाश में है गुंचाए-दिल
तुम जन्नत-ओ-हयात हो

गुलाबी पैमाने छलकते हैं
लबों पर अंगारे सुलगते हैं
पतंगा करे तेरी लब-बोसी
गर इख़लास-ओ-सबात हो

क़ुर्बां तेरे शोख़ी-ओ-नाज़ पे
मुआ जाऊँ तेरे एतराज़ पे
फ़साने में जाँ भर दी तुमने
यह कि अब इख़्तिलात हो

इल्तफ़ात= favour, friendship; मुक़द्दस= clean, pious; बख़्त= lucky; गुंचाए-दिल= bud of heart; लब-बोसी= kiss on lips; इख़लास= love, worship; सबात= constancy, endurance; मुआ= sacrifice; इख़्तिलात= love


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

वह चाँद से तेरी बातें करना याद आया

वह चाँद से तेरी बातें करना याद आया
तेरे लिए सरे-बाम खड़ा होना याद आया

गो आज फिर भीग गये पलकों के किनारे
वह तुझे देखकर मुस्कुराना याद आया

तबीयत के सभी रंग नासाज़ी ने ले लिये
वह दिन-रात ख़ुद से लड़ना याद आया

देखिए खेल लुक-छुप का कब तक चले
वह तेरा मुझे देखके न देखना याद आया

‘नज़र’ से पूछो वह नज़रों का मेल-जोल
न मिलकर भी सब कुछ कहना याद आया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३