मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा

मैं ज़हर का असर ढूँढ़ता फिरा
वह शामो-सहर ढूँढ़ता फिरा

जिस बाज़ार में ग़म बिकते हों
उसे दिनो-दोपहर ढूँढ़ता फिरा

आस एक बुझी-बुझी है दिल में
मैं हर गली शरर ढूँढ़ता फिरा

कोई खोदे वह यहीं दफ़्न है
‘नज़र’ जिसे बेख़बर ढूँढ़ता फिरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३ 

ज़बीने-माह पर गेसू की लहर याद आती है

जबीने-माह पर गेसू की लहर याद आती है
वह गुलाबी ख़ुशरंग शामो-सहर याद आती है

जिसने हमें ज़िन्दगी का दीवाना कर दिया
वह उसकी क़ातिल तीरे-नज़र याद आती है

एक शाल में लिपटी बैठी रहती थी जब तुम
वह सर्दियों की गर्म दोपहर याद आती है

जिसे तुमने घर आके भी न पढ़ा मेरी आँखों में
वह फ़ुग़ाँ वह आहे-कम-असर याद आती है

बाइस नहीं खुलता तुम से बिछड़ जाने का
आज वह पहला प्यार वह उमर याद आती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद

ज़िन्दगी से दर्द’ दर्द से ज़िन्दगी मिली है
ज़िन्दगी के वीराने में तन्हाई की धूप खिली है

मैं रेत की तरह बिखरा हुआ हूँ ज़मीन पर
उड़ता जा रहा हूँ उधर’ जिधर की हवा चली है

मैं जानता हूँ उसका चेहरा निक़ाब से ढका है
महज़ परवाने को लुभाने के लिए शम्अ जली है

बदलता है वो रुख़ को चाहो जिसे जान से ज़्यादा
मेरी तो हर सुबह’ दोपहर’ शाम यूँ ही ढली है

आज देखा उसे जिसे कल तक दोस्ती का पास था
आज देखकर उसने मुझे अपनी ज़ुबाँ सीं ली है

किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद
अब तन्हा जियो तुमको ऐसी ज़िन्दगी भली है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

बड़ी उदास दोपहर है

बड़ी उदास दोपहर है, दिल भी ख़ाली
मेरा कमरा भी ख़ाली…

कुछ यादों का धुँधलाया हुआ-सा
एक क़ाफ़िला गुज़र रहा है,
आँख जो भर-भर आ रही है
किनारों की काई फिर सब्ज़ होने लगी है

इक दर्द फिर अँगड़ाई ले रहा है
एक आस फिर तेरी जुस्तजू कर रही है

माज़ी के सफ़्हे पलट रहा हूँ
बीती हुई शामों की नर्म धूप-
मेरा मन पिघला रही है,
बदन में फिर साँस भारी होने लगी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८/अगस्त/२००४