मैंने अक्सर खोया है उसे

मैंने अक्सर खोया है उसे
जो मेरे दिल के क़रीब आ जाता है
जब किसी की चाह में भटकता हूँ
यह दिल बहुत समझाता है

शायद इसी एक वजह से
किसी की हसरत से जी डरता है
बेपनाह प्यार करता है जिससे
तिल-तिलकर उसके लिए मरता है

कई बार मातम में ख़ुद को
सफ़ेद पोशाक पहने हुए देखा है मैंने
इसीलिए इक दीवार उठा रखी है
निगाहो-निगाहे-पनाह के बीच मैंने

हर शाम ज़हन के दरवाज़े पर
इक माज़ी की दस्तक होती है
तेरा पुराना पता पूछती ज़िन्दगी
मुझसे रोज़ ही रूब-रू होती है

वह यह बारहा कहती है मुझसे
मुझे इश्क़ है तुझसे, तुझी से
और मैं आँख चुराके कहता हूँ
मुझे इश्क़ नहीं तुझसे, किसी से

क्यों चली आयी है इस राह
ख़ुशबू के आवारा बादल की तरह
कि नाचीज़ का दिल काला है
तेरी आँखों के काजल की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

एक लड़की

एक लड़की मुझको सारा दिन परेशाँ किये घूमती है
ख़ाबों में भी आयी ख़्यालों को हैराँ किये रहती है

उसकी बातों में जाने कैसी ख़ुशबू है नाज़ुक मिज़ाज की
अदाए-हरकत है कभी गुल तो कभी मिराज़ की

यूँ तो इस जा में मेरी शख़्सियत है खाकसार-सी
लफ़्ज़ यूँ बुनती है’ जैसे हूँ तबीयत ख़ाबे-ख़ुमार की

चाहती क्या है, बात क्या है, मैं पता करूँ तो कैसे?
दर्दो-ग़म की बात छोड़, दिल का भेद तो कह दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

Life is still like the past

I tried but it doesn’t work
I can’t eat food with fork
Life is still like the past
Nothing changed, you can see

Colour has been fade
But  rose has fragrance
Do you remember about
That rose you gave me baby

Life is still like the past
Nothing changed, you can see

When first I saw you
I was on the way to market
But your one sight
Stopped life for a moment

I can forget that eve of may
That magic you webbed
On my heart, on my mind
Baby, I still unspelled

Life is still like the past
Nothing changed, you can see

Where have you gone?
A devil don’t want to live me
My heart is aching but
I know you can’t save me

I’ve tried but it doesn’t work
I can’t eat food with fork
Life is still like the past
Nothing changed, you can see


Words: Vinay Prajapati
Concept: 1998
Penned: 2008

उसने मुझको माटी समझा

मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा
मुझे उम्मीद रही वो मुझको
सोने की तरह छूकर देखेगा…

उसने कुछ तो किया अपनेपन-सा
और बेग़ाना बनकर भी दिखाया
वो चल तो रहा था साथ-साथ मेरे
मगर उसने थोड़ा नाज़ भी दिखाया

शिक़स्त के पहरे मुझ पर बहुत कड़े हैं
कि मैं कभी जीता भी और हारा भी
मेरे पहलू में बैठे है दोनों –
शाम का सूरज और सुनहरा चाँद
मैंने इक को जलाया और इक को बुझाया भी

सूनी शाख़ें मुझको बहुत हसीन लगने लगीं,
उसने पत्तों को इस क़दर ज़मीं पर गिराया…
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा

उसका जी बहुत अजीब है
सिर्फ़ अपनी ही सुनता है
मुझको पास बुलाके वो मुझसे दूर गया भी
जाने क्यों वह मुझे
अपनों के सामने अपना समझा
ग़ैरों के सामने तो
वो मेरी तरफ़ देखता भी नहीं

अजब हाल करके रखा है उसने मेरा
कभी खा़ब में खु़द आया कभी मुझको बुलाया…
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३