वक़्त उस राह पर रुका-सा है

वक़्त उस राह पर रुका-सा है
दिल तुझे देखकर झुका-सा है
waqt us raah par rukaa-saa hai
dil tujhe dekhkar jhukaa-saa hai

ख़ाब उलझा हुआ है आँखों में
बुझ रहा है मगर धुँआ-सा है
kh.aab uljhaa huaa hai aa’mkho’n mein
bujh rahaa hai magar dh’maa-saa hai

तुम नहीं समझ पाओगी मुझको
दिल यही सोचकर दुखा-सा है
tum nahii’n samajh paa’ogii mujhko
dil yahii sochkar dukhaa-saa hai

फ़ासला लाज़मी नहीं था पर
आज ये ज़ख़्म कुछ बुझा-सा है
faslaa laazmii nahii’n thaa par
aaj ye zakh.m kuchh bujhaa-saa hai

प्यार तुम्हें हुआ नहीं मुझसे
दर्द का चाँद’ पर छुपा-सा है
pyaar tumhe’n huaa nahii’n mujhse
dard kaa chaa’nd par chhupaa-saa hai

वक़्त गायक नहीं मगर फिर भी
राग इक छेड़कर चुभा-सा है
waqt gaayak nahii’n magar phir bhii
raag ek chheRkar chubhaa-saa hai

ख़ुश नहीं हो मुझे हराकर तुम
सच, मुझे जान कुछ शुबा-सा है
kh.ush nahii’n ho mujhe haraakar tum
sach, mujhe jaan kuchh shubaa-saa hai

पी रहा हूँ मुझे मना मत कर
आज ये जाम दिलरुबा-सा है
pee rahaa huu’n mujhe manaa matkar
aaj ye jaam dilrubaa-saa hai

देख लो इक नज़र मुझे तुम भी
बादबाँ आज फिर खुला-सा है
dekh lo ek nazar mujhe tum bhii
baadbaa’n aaj phir khulaa-saa hai

तुम सही, ये सही नहीं, लेकिन
वक़्त पानी का बुलबुला-सा है
tum sahii, ye sahii nahii’n lekin
waqt paanii kaa bulbulaa-saa hai

चाहकर भी तुझे नहीं भूला
रंग में रंग पर घुला-सा है
chahkar bhii tujhe nahii’n bhoolaa
rang me’n rang ghulaa-saa hai

बहर: 212 212 1222 । ख़फ़ीफ़

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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 03:02 11-10-2011
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 03:02 11-10-2011

नै बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा हूँ

नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ
मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ

गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा न तर्ज़े-जाम४
इस मैकदे के बीच अबस५ आफ़रीदा६ हूँ

तू आपसे७ ज़बाँज़दे-आलम८ है वरना मैं
इक हर्फ़े-आरज़ू९ सो ब-लब१० नारसीदा११ हूँ

कोई जो पूछता हो ये किस पर है दादख़्वाह१२
जूँ-गुल हज़ार जा से गरेबाँ-दरीदा हूँ१३

तेग़े-निगाहे-चश्म१४ का तेरे नहीं हरीफ़१५
ज़ालिम, मैं क़तर-ए-मिज़ए-ख़ूँचकीदा१६ हूँ

मैं क्या कहूँ कि कौन हूँ ‘सौदा’, बक़ौल दर्द
जो कुछ कि हूँ सो हूँ, ग़रज़ आफ़त-रसीदा१७ हूँ

शब्दार्थ:
१. न तो, २. नया खिला फूल, ३. टूटी शाख़, ४. न शीशे की तरह से रो रहा हूँ और न जाम की तरह से हँस रहा हूँ, ५. व्यर्थ ही, ६. लाया गया, ७. स्वयं ही, ८. दुनिया की ज़बान पर चढ़ा हुआ, ९. आरज़ू का शब्द, १०. होंटो पर, ११. पहुँच से वंचित, १३. दाद चाहनेवाला, १४. फूल की तरह हज़ार जगह से मेरा गरेबान फटा हुआ है, १४. निगाहों की तलवार, १५. प्रतिद्वंदी, १६. ख़ून रो रही पलकों पर टिका हुआ क़तरा, १७. आफ़त में फँसा हुआ


शायिर: मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी
उन आँखों में छिपी एक उजली रात थी

जब देखा था मंज़रे-हसीन-हुस्न1 मैंने
उस लम्हा चाँद था और सितारों की बरात थी

साहिब हमें दाँव-पेंच नहीं आते इश्क़ में
और वह प्यार की पहली दूसरी हर मात थी

वह शब2 नहीं भूले जब घर आये थे तुम
उफ़! वह निगाह की निगाहों से मुलाक़ात थी

हम ने दर्द पहने, ओढ़े और बिछाये हैं
एक नयी जलन की यह एक नयी शुरूआत थी

हमने जिसे दिल में जगह दी उसने दग़ा3 किया
हर एक मतलबी की अपनी एक ज़ात थी

रात बादल नहीं थे और चाँद भी रोशन था
साथ हो रही उस की यादों की बरसात थी

जिसने मुझे छूकर तख़लीक़4 किया है ‘नज़र’
गोया5 वह भी इक नज़रे-इल्तिफ़ात6 थी

शब्दार्थ:
1. हसीन हुस्न वाले मंज़र; 2. रात; 3. धोख़ा; 4. आस्तित्व में लाना; 5. जैसे; 6. दोस्ती की नज़र


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

सहर-ब-सहर मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ

सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2
कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें

न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना
मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें

है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे
असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3

न दोस्त न नासेह4 न चारागर5 न वाइज़6
कोई भी नहीं लेता अपने सर ये बलाएँ

जो जाते हैं अपना दामन छुड़ा के ‘नज़र’
कह दो कि जाते हैं तो सब कुछ ले जाएँ

शब्दार्थ:
1. एक सुबह से अगली सुबह तक, 2. किरण, 3. प्रार्थनाएँ, 4. नसीहत करने वाला, 5. इलाज करने वाला, 6. बुद्धिमान


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४