रातभर चाँद देखा किये

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये
रातभर चाँद देखा किये

कभी हाथ से ढका चाँद को
कभी बादलों से उठाया भी
गदेली पर रखकर उसे
कभी होंटों तक लाया भी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सितारे टूटते बुझते रहे
उनसे तुम्हें माँगते रहे
ख़ाली था ख़ामोश था लम्हा
हम तेरा नाम लिखते रहे

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

रूह बर्फ़ में जलने लगी
साँस-साँस पिघलने लगी
तेरी तस्वीर देखकर
तन्हाई मसलने लगी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सन्नाटों में बहता रहा
ख़ामोशी से कहता रहा
तुम कहाँ अब कैसी हो
मैं कोहरे सहता रहा

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

टूटे हुए चाँद को

टूटे हुए चाँद को सादे काग़ज़ में लपेटा मैंने
भीगे हुए सूरज को हथेलियों में समेटा मैंने
तारे बसरने लगे और आसमाँ ख़ाली हो गया
उसने एक आइने की तरह मुझे तोड़ दिया है
…तोड़ दिया है

जला दिये दिल के जज़्बात उसने
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है

बहार में भी शाख़ों पर ख़िज़ाँ थी
सूखी-सूखी बंजर हर फ़िज़ा थी
फ़िज़ाएँ रंग बदलने लगी हैं
हवाओं के साथ चलने लगी हैं मगर
उसने निगाहों में खिलना छोड़ दिया है
…छोड़ दिया है

फ़िज़ाएँ मौसम के साथ खिलती हैं
और मौसम बदलते रहते हैं
मौसम बदला है तो फ़िज़ा भी बदलेगी
बदले हुए मौसम ने हज़ार रास्तों को
मेरी तरफ़ मोड़ दिया है, मोड़ दिया है
…मोड़ दिया है

शब्दों की स्याही में रिश्ते हैं
फूलों के अर्क़ में रिश्ते हैं
हर शब्द हर फूल में मिलते हैं
हर जिस्म की शाखों पर खिलते हैं
मिलते हैं बिछुड़ते हैं,
बिछुड़ते हैं मिलते हैं
समंदर की लहर जैसे चलते रहते हैं
खिलते हैं महकते हैं
बनते हैं बुझते हैं
यह धूप-छाँव के जैसे रंग बदलते हैं

उसने एक रिश्ता तोड़ा है इक जोड़ दिया है
जोड़कर उसने रिश्ते को फिर तोड़ दिया है
…तोड़ दिया है

जला दिये दिल के जज़्बात उसने
बढ़ा दिये मेरे मुश्किलात उसने
जीना मेरा जीना बहुत मुश्किल है
यह ज़हर पीना बहुत मुश्किल है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे

तुमने पुकारा था जब
मैंने सुना तो था
मगर मेरा ग़ुरूर
मेरे ज़हन पे यूँ चढ़के बैठा था
कि मैंने देखा भी न तेरे जानिब

जाने किस मशक्कत में
रहा होगा तेरा दिमाग़
जाने तुमने क्या-क्या न सोचा होगा
दुबारा जब तुमने
निगाह चुराके देखा था
उस वक़्त भी तो मैं
ग़ुरूर को आगोश में लिए गुज़रा था

वक़्त की नब्ज़ तो
बहुत भारी लग रही थी
उस पहर मुझे…
जाने किस ख़्याल को
बाँहों में भरकर
तुम घर जा रहे थे

पहुँचा तो था मैं
मगर देर से पहुँचा था
वो दिन का चाँद
मेरी हथेली से फिसल चुका था,
जा चुका था…

“कल फिर मिलना होगा
कल फिर नये बहाने होंगे
कोई इशारा बयाँ होगा
लफ़्ज़ तुम्हें नये बनाने होंगे”

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे
जो ज़रा भी ग़ुबार हो मन में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२