ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं

तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं
पत्थर है दिल मेरा नहीं सच नहीं

मुझको यक़ीं ख़ुद पे नहीं है सनम
दूर रहके तू मुझसे नहीं ख़ुश नहीं

खोया होता जब मैंने तुझे पाया होता
खोने-पाने पर किसी का कोई वश नहीं

जो इश्क़ बचा हो आइनें में ज़रा भी
हम साथ होंगे दिन वह भी दूर नहीं

ख़फ़ा रहे तू मेरी किसी बात से अब
इस बात में रत्ती भर भी सच नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

सिवा इससे जो भी हो, करेंगे

सिवा इससे जो भी हो, करेंगे
महब्बत तुझ बिन किसी से न करेंगे

क़ज़ा ने भी हमसे ताक़त आज़माई की
तुझ बिन हम जहाँ से न चलेंगे

ख़ूब-रू कितने ही हुस्न दिखाते हैं
हम उनसे मुँह लगाई न करेंगे

बियाबाँ में ढकेला मुझको ग़मों ने
तू कहे गर यह सफ़र हम करेंगे

अरमान तेरा न जायेगा ख़ातिर से
हम दश्त को भी जाए-चश्म करेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तख़लीक़ हुआ है [ver. 2.0]

मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा
तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है
यह ‘विनय’…

नया जन्म हुआ है तो
नये अहसास भी होंगे
अभी-अभी मेरी मुट्ठी में
जन्मी है यह क़िस्मत

खुलेगी जो कई और कई
जीतों के जश्न भी होंगे
जिससे मेरी हर सोच जुड़ी है
सिर्फ़ एक तुम हो!

मेरी इब्तिदा मेरे ये जश्न
सब तुम्हीं से तो हैं…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

तख़लीक़ हुआ है यह विनय

मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा,
तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है
यह ‘विनय’

अभी-अभी मेरी मुट्ठी में
जन्मी है यह क़िस्मत
खुलेगी जो कई और कई
हासिलों के मुक़ाम आयेंगे

जिससे मेरी हर सोच जुड़ी है
वह सिर्फ़ एक तुम्हीं हो
मेरी इब्तिदा, ये ख़ुशगँवारियाँ
सब तुम्हीं से तो हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३