किसी राह तुमसे मुलाक़ात होगी

किसी राह तुमसे मुलाक़ात होगी
फिर हल्की-हल्की बरसात होगी
तुम मुझसे इक़रारे-प्यार करना
ज़िन्दगी की नयी शुरुआत होगी

तेरे पहलू में बैठेंगे दो बातें होंगी
फिर ख़त्म दर्द की रातें होंगी
ग़म भूल जायेंगे प्यार जवाँ होगा
वस्ल की हर शब पहली रात होगी

किसी राह तुमसे मुलाक़ात होगी
फिर हल्की-हल्की बरसात होगी

प्यार की दुनिया सजायेंगे प्यार से
निखर जायेगा घर तेरे सिंगार से
चाँदनी ओढ़ के बैठेंगे सर्द रातों में साथ
कुछ तेरी कुछ मेरी बात होगी

तुम मुझसे इक़रारे-प्यार करना
ज़िन्दगी की नयी शुरुआत होगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

कुछ ऐसा ही होता है

ज़ोर से दिल धड़कता है (हाँ धड़कता है)
तूफ़ान साँसों में चलता है (हाँ चलता है)
आँखें ठहर जाती हैं
तस्वीरें गुज़र जाती हैं
जब प्यार किसी से होता है
कुछ ऐसा ही होता है…

दिल इक़रार करता है (हाँ डरता है)
पर इज़हार से डरता है (हाँ करता है)
बेचैन हो जाता है
सब कुछ बदल जाता है
जब प्यार किसी से होता है
कुछ ऐसा ही होता है…

अफ़सोस करता है (हाँ करता है)
तस्व्वुर को तरसता है (हाँ तरसता है)
वो सपनों में रोज़ मिलता है
जिस पर दिल फिसलता है
जब प्यार किसी से होता है
कुछ ऐसा ही होता है…

दीदार को दीवाना होता है (हाँ होता है)
इश्क़ आशिक़ाना होता है (हाँ होता है)
शमअ का परवाना होता है
तीरे-नज़र का निशाना होता है
जब प्यार किसी से होता है
कुछ ऐसा ही होता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कभी वैसे होता है

कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है
यह प्यार जो होता है,
प्यार ही  रहता  है…

तुमको सब पता है
हमको सब पता है
तुम भी दीवाने हो
हम भी दीवाने हैं
यह सबको पता है
कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है

मस्ती है तुमको भी
मस्ती है हमको भी
तुमको भी चाहत है
हमको भी चाहत है
यह किसकी ख़ता है
कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है

नज़रों का चलना
दिल का मचलना
चलते-चलते फिसलना
गिरते-गिरते संभलना
ऐसा ही कुछ होता है
कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है

जब भी मिलते हैं
साथ-साथ चलते हैं
क्या बातें करते हैं
कहने से डरते हैं
चैन कहाँ मिलता है
कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है

इक़रार गर हो जाये
इज़हार गर हो जाये
हो जाये इक कमाल
हो जाये इक वबाल
ऐसा ही लगता है
कभी वैसे होता है,
कभी ऐसे होता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

रक़ाबी चाँद जला दो

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये
कभी तो पास बुला लो
तेरी नज़दीकियों का
मुझे एहसास हो जाये

गुलाबी शाम ढलती है
रोज़ गुज़रती हो
मेरे घर के सामने से
मैं दिल थाम के बैठा रहता हूँ
आइना जब भी हो हाथों में
उससे तेरी बातें करता हूँ…

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये
एक रिश्ता बना लो
मुलाक़ात लाज़मी हो जाये

तेरे सिले हुए लबों पर
क्या इक़रार होगा
मेरा ख़्याल है कि इज़हार होगा
बात कोई नही, बात तुम में है
मैं न हूँ शायद तुझमें
पर तू मुझमें है…

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

दिल की लगी दिल को दिल से लगी

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

उठता है तूफ़ाँ दिल में बनते हैं निशाँ
फैला हर दिशा यह यहाँ से वहाँ
बसा है दो दिलों में ख़ुशबू की तरह
नाम मुहब्बत है ख़ुदा की तरह
पतझड़ जाता है और सावन आता है
जब दिल में कोई उन्स जगाता है

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

चेहरे पर नज़रें रुकीं फिर पलकें झुकीं
होंठों पर नाम है आँखें सपने बुनती हैं
अफ़साने बनते हैं पन्ने भी खुलते हैं
मिटता है सब-कुछ ज़माने से सुनते हैं
कोहरे-से बिछते हैं दो दिल मिटते हैं
मोहब्बत के निशाँ बनते न मिटते हैं

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९