सहूलियत मत देख रिश्तों में दोस्त

सहूलियत मत देख रिश्तों में दोस्त
फ़र्क़ है इंसाँ और फ़रिश्तों में दोस्त
sahooliyat mat dekh rishto’n mein dost
farq hai insaa’n aur farishto’n mein dost
11:06 25-08-2013

किसी बात का तज़किरा उतना ही कर
नुमाया न हो रंज ‘ किश्तों में दोस्त
kisii baat ka tazkiraa ut’naa hii kar
numaayaa na ho ranj ‘ kishto’n mein dost
11:26 25-08-2013

फ़सल पक रही है सुकूँ है ख़ुशी है
टँगा है वहाँ चाँद दरख़्तों में दोस्त
fasal pak rahii hai sukoo’n hai khushii hai
Ta’ngaa hai wahaa’n chaa’nd darkh.to’n mein dost
13:16 25-08-2013

ग़मी टपकती है अश्क बनके यारब
बुनूँ ख़ाब को ख़ुश्क पत्तों में दोस्त
ghamii Tapakatii hai ashk banke yaarab
bunoo’n kh.aab ko kh.ushk pat’to’n mein dost
14:07 25-08-2013

किताबें खुली हैं’ वो पढ़ भी रहे हैं
हँसी क्यों छिपे बंद बस्तों में दोस्त
kitaabein khulii hain, wo paDh bhii rahe hain
ha’nsii kyo’n chhipe band bassto’n mein dost
15:00 25-08-2013

लिखा नाम तेरा औराक़े-गुल पे
किये सजदे-मस्जूद रस्तों में दोस्त
likhaa naam teraa auraaq-e-gul pe
kiye saj’de-masjood rasto’n mein dost
15:55 25-08-2013

‘नज़र’ दर्द इख़लास की है निशानी
यही ख़ू रखी चंद रिश्तों में दोस्त
‘Nazar’ dard ikh.alaas kii hai nishaanii
yahii kh.oo rakhii chand rishto’n mein dost
16:11 25-08-2013

बहर/Baher:122 122 122 122
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३
Poet Vinay Prajapati
Penned: 16:11 25-08-2013

हर वो शख़्स जिसको मैंने अपना ख़ुदा कहा

हर वो शख़्स जिसको मैंने अपना ख़ुदा कहा
बादे-मतलब उस ने मुझ से अलविदा कहा

जिसे मैं मानता हूँ धोख़ा-ओ-अय्यारी यारों
ज़माने ने उस को हुस्न की इक अदा कहा

वह प्यार जिस को एहसास कहते थे सभी
उसने आज उसको बदन की इक सदा कहा

मैं था उसके पीछे ज़माने की ग़ालियाँ खाकर
उस ने मुझे किसी ग़ैर हुस्न पर फ़िदा कहा

जिन आँखों का तअल्लुक मैं देता था मस्जिद से
उसे उस के यार ने महज़ इक मैक़दा कहा

मैं कहता था उससे अपने ज़ख़्मों की कहानी
उसने कुछ और नये ज़ख़्मों को तयशुदा कहा

सदा: पुकार, call; बादे-मतलब: मतलब पूरा होने के बाद, ; धोख़ा-ओ-अय्यारी: धोख़ा और चालाकी, cheating and cleverness; तअल्लुक: ताल्लुक, relation; मैकदा:शराबख़ाना, bar; तयशुदा:निश्चित, certain


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते

दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते
आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते

होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता
मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते

ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ
मगर दाग़े-दिल उसे दिखाये नहीं दिखते

हैं जो हमको ज़ख़्म’ सो तेरे तस्व्वुर से हैं
यह ज़ख़्म सीने से मिटाये नहीं मिटते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ज़िन्दगी के दर्द बहुत ज़िन्दगी के काम आये

ज़िन्दगी के दर्द बहुत ज़िन्दगी के काम आये
जिनसे मतलब नहीं था हमें वो मुक़ाम आये

अपनों का कब हमें नसीब साथ दो क़दम हुआ
तसल्ली के हाथों हमें’ ग़ैरों के सलाम आये

क्या किसने किया यह हिसाब मैं किस-किस को दूँ
हर एक ज़ुबाँ से मुझको सैकड़ों इल्ज़ाम आये

वह कहेंगे अगर तो हम अपनी जान दे देंगे
वह नहीं आते तो क़ासिद के ज़रिए कलाम आये

हम में क्या है यह बात अगर वह जान लेंगे
फिर शायद वह क़ुर्बत की फ़ज़िरो-शाम आये

क़ासिद: डाकिया, Postman | क़ुर्बत: मिलन, Nearness | फ़ज़िर: भोर, Dawn


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४