फिर वही दर्द, वही शाम है

फिर वही दर्द, वही शाम है
लबों पर फिर तेरा नाम है

ज़िन्दा हूँ पर ज़िन्दगी नहीं
सीने में साँसों का ताम-झाम है

नतीजा-ए-इम्तिहाँ कुछ नहीं
मेरा यह कैसा अन्जाम है

मंज़िल से है अब तलक फ़ासला
मेरी हर कोशिश नाकाम है

मुझको न पसन्द आया कोई
तेरे दिल में मेरा मुक़ाम है

कहिए दिलो-जाँ क्या चाहिए
‘नज़र’ तो आपका ग़ुलाम है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम मेरे हो

तुम मेरे हो, मेरे ही मेरे हो
कितनी हों दूरियाँ, कितने हों फ़ासले
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

दोनों हाथों की लकीरों में लिख लूँ
मैं तुम्हें इस जहाँ से छीन लूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

पागल, शैदाई, क़ातिल हूँ तेरे लिए
हाँ मेरी जान तुम्हें पाने के लिए
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

मुश्किलों को आसाँ करना आता है
मुझे हद से गुज़रना आता है
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जो तुम्हें देखे उसका अंजाम हूँ
मैं और मैं ही तेरा मक़ाम हूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

लहू के क़तरे-क़तरे में तुम हो
दिल में धड़कनों में तुम हो
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जान हो, ज़िन्दगी हो, तुम मेरी
ख़ुदा से बन्दगी हो, तुम मेरी
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

आओ तुमको अपना बना लूँ मैं
दिल, जान, सीने से लगा लूँ मैं
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

क्या वह तुम थे

क्या वह तुम थे
जो आँखों को महका गये
तमन्ना दबी-सी
मेरे दिल में सुलगा गये
मैं कितना तन्हा फिर रहा था
जी रहा था यों कि
रोज़ मर रहा था
तुमने जो धड़कनें जवाँ कीं
मुझको ख़्यालों में उलझा गये

शाम के साथ तुमको देखकर
बेक़ाबू हो गया मैं
क्या कहूँ ख़ुद को
अन्जाम-ए-जुस्त-जू हो गया मैं
दूरियों का यह परदा
उठ जाये ज़रा
तुम अरमान मेरे पिघला गये

यह तस्वीरे-नशा
मैं पलकों से उठाऊँ कैसे
डर लगता है
खो जाये न कहीं
इक बार तो गुज़रो
मेरे दर से कि मैं समझूँ
तुम हो यहीं
तुम ढलती शाम
यह कैसे ख़ाब दिखला गये

मेरी साँसों को यह ठण्डक
कैसी पड़ गयी है
एक चाहत के ख़ाब की
शमअ जल गयी है
मैं बदला कहाँ हूँ वही हूँ
तुम जानम मुझे
बीती गलियाँ लौटा गये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

क्यों हो गया न प्यार…!

यह प्यार चीज़ क्या है?
दीवानों का है काम
बेकार ही पीछे दौड़ते हैं
बिन सोचे अन्जाम

कहते थे कि प्यार हमको होगा नहीं
क्यों हो गया न प्यार…!

बहुत तन के चलते थे
जब घर से निकलते थे
प्यार में क्या रखा है
बस एक ही बात रटते थे

आज मुँह पर उल्टी आ पड़ी हर बात
क्यों हो गया न प्यार…!

आज क्या हुआ
वह नाक पे बैठा हुआ गुस्सा
चलो लाओ दो हमें
प्यार में हमको हमारा हिस्सा

अजी नज़र चुराकर कहाँ चल दिए
क्यों हो गया न प्यार…!

प्यार ख़ूबसूरत है
यह दिल की ज़रूरत है
दुनिया में बस यही
ख़ुदा की एक इनायत है

आज तुमको हो गया हमपे एतबार
क्यों हो गया न प्यार…!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १० मई २००३

बेवफ़ा कहकर तुझको कोई इल्ज़ाम न दूँगा

बेवफ़ा कहकर तुझको कोई इल्ज़ाम न दूँगा
अपनी पाकीज़ा मोहब्बत को दुश्नाम न दूँगा

उन सिलसिलों की ख़ुशबू आज भी आँखों में रची है
इस रंगे-हिना को अश्कों का अन्जाम न दूँगा

तेरे हुस्न की बर्क़ ने मारा है दीवाना करके
तेरा ग़ुलाम हूँ किसी के हुज़ूर में सलाम न दूँगा

तू हर्फ़े-मुक़र्रर है मेरी तक़दीर में जानाँ
मैं किसी भी ग़ैर को अपने दिल में मुक़ाम न दूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३