मानूस हर्फ़

शाम उतर रही थी,
मैं सोफ़े पे लेटा
अपने सफ़र की थकान
उतार रहा था…
हाँ, उसी शाम
उसका… फ़ोन तो आया था,
कि घर आएगी वो…

कहीं बाहर मिलने का भी…
प्लान बना था

लेकिन –
घर के दरवाज़े
आज भी… मेरी तरफ़ देखते हैं,
पूछते हैं मुझसे…

चौखट के इस पार…
और चौखट के उस पार में
कितना फ़ासला है?

किसी ख़ार में उसका दामन
अटका है… या फिर,
वक़्त ने बहला-फुसला लिया उसे…

वो आयी नहीं
चैट हो जाया करती है कभी-कभी
उसके मानूस हर्फ़, वो कहती नहीं मगर
सीले-सीले से लगते हैं
जिन्हें वो शायद टीसू पेपर
या रूमाल से पोंछती रहती है

कि शायद कहीं…
मेरे उजाड़ दिल की दीवारों पर
काई न जमने लगे

Penned: 15:05 04-11-2014
© Vinay Prajapati, All rights reserved.

रोना था इसलिए मिला मैं तुझे

सावन बदल गया, मुआ टल गया
घोर अंधेरा था, दिया जल गया
बातें तेरी… भूल जाऊँ दिलाँ…
टूटा-टूटा अश्क भी गल गया

sawan badal gayaa, mu’aa Tal gayaa
ghor andhera tha, diyaa jal gayaa
baatein terii… bhool jaau’n dilaa’n…
TooTaa-TooTaa ashk bhii gal gayaa

रुक-रुक कर ये रास्ता चला है
थम-थम कर ये फ़ासला बढ़ा है
सूरज थामा था लेकिन ढल गया

ruk-ruk kar ye raasta chalaa hai
tham-tham kar ye faasla badh.aa hain
sooraj thaamaa thaa lekin dhal gayaa

रोना था इसलिए मिला मैं तुझे
ये मेरा दर्द मैं सुनाऊँ किसे?
छोटा-सा लम्हा मुझे खल गया

ronaa thaa isliye milaa main tujhe
ye meraa dard main sunaa’un kisey
chhoTa-sa lamhaa mujhe khal gayaa

बह्र: 222 2212 212
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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 01:00 25-08-2014
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 01:00 25-08-2014

वक़्त उस राह पर रुका-सा है

वक़्त उस राह पर रुका-सा है
दिल तुझे देखकर झुका-सा है
waqt us raah par rukaa-saa hai
dil tujhe dekhkar jhukaa-saa hai

ख़ाब उलझा हुआ है आँखों में
बुझ रहा है मगर धुँआ-सा है
kh.aab uljhaa huaa hai aa’mkho’n mein
bujh rahaa hai magar dh’maa-saa hai

तुम नहीं समझ पाओगी मुझको
दिल यही सोचकर दुखा-सा है
tum nahii’n samajh paa’ogii mujhko
dil yahii sochkar dukhaa-saa hai

फ़ासला लाज़मी नहीं था पर
आज ये ज़ख़्म कुछ बुझा-सा है
faslaa laazmii nahii’n thaa par
aaj ye zakh.m kuchh bujhaa-saa hai

प्यार तुम्हें हुआ नहीं मुझसे
दर्द का चाँद’ पर छुपा-सा है
pyaar tumhe’n huaa nahii’n mujhse
dard kaa chaa’nd par chhupaa-saa hai

वक़्त गायक नहीं मगर फिर भी
राग इक छेड़कर चुभा-सा है
waqt gaayak nahii’n magar phir bhii
raag ek chheRkar chubhaa-saa hai

ख़ुश नहीं हो मुझे हराकर तुम
सच, मुझे जान कुछ शुबा-सा है
kh.ush nahii’n ho mujhe haraakar tum
sach, mujhe jaan kuchh shubaa-saa hai

पी रहा हूँ मुझे मना मत कर
आज ये जाम दिलरुबा-सा है
pee rahaa huu’n mujhe manaa matkar
aaj ye jaam dilrubaa-saa hai

देख लो इक नज़र मुझे तुम भी
बादबाँ आज फिर खुला-सा है
dekh lo ek nazar mujhe tum bhii
baadbaa’n aaj phir khulaa-saa hai

तुम सही, ये सही नहीं, लेकिन
वक़्त पानी का बुलबुला-सा है
tum sahii, ye sahii nahii’n lekin
waqt paanii kaa bulbulaa-saa hai

चाहकर भी तुझे नहीं भूला
रंग में रंग पर घुला-सा है
chahkar bhii tujhe nahii’n bhoolaa
rang me’n rang ghulaa-saa hai

बहर: 212 212 1222 । ख़फ़ीफ़

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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 03:02 11-10-2011
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 03:02 11-10-2011

थोड़ी कशिश तुझसे, थोड़ा क़रार रहने दे

थोड़ी कशिश तुझसे’ थोड़ा क़रार रहने दे
पागल दिल को ज़रा बेइख़्तियार रहने दे
thoRii kashish tujhse’ thoRaa qaraar rahne de
paagal dil ko zaraa be-ikh.ti’yaar rahne de

दीन जुदा हैं अगर तो क्या हुआ, मेरे रब्बा
दिल की तड़प का हल्का-सा ख़ुमार रहने दे
deen juda hain agar to kyaa huaa’ mere rabba
dil kii taRap ka halkaa-sa kh.umaar rahne de

तुम्हें हँसकर कभी देखा न जाये है मुझसे
दिल में अपने जलन की ये शरार रहने दे
tumhein ha’nskar kabhii dekhaa na jaaye hai mujhse
dil mein apne jalan kii ye sharaar rahne de

मैं तेरा हो नहीं सकता, ज़ख़्म सुलगते हैं
अच्छा है, मेरे दिल को सोगवार रहने दे
main teraa ho nahii’n sakta, zakh.m sulag’te hain
achchha hai, mere dil ko sog’vaar rahne de

ज़िद करना तेरे हक़ में अब नहीं रहा, गोया
दिल हल्का हो गया लेकिन ग़ुबार रहने दे
zid karna tere haq me ab nahii’n raha, goya
dil halka ho gaya lekin ghubaar rahne de

बहस न छेड़ बढ़ती जायेगी, इश्क़ अक़ीदत है
वाइज़, मुझमें हक़ीक़त ये शुमार रहने दे
bahas na chheR baDh.tii jaayegii, ishq aqeedat hai
vaa’iz mujh mein haqeeqat ye shumaar rahne de

ज़ुल्म सहे फिर भी ख़ामोशी रही दुआ बनकर
तुझ पर जान कुछ मेरा ऐतबार रहने दे
zulm sahe phir bhii kh.moshii rahii duaa ban’kar
tujh par jaan kuchh meraa ai’tbaar rahne de

मैं ख़ुद से किनारा करके जुदा रहा ख़ुद से
अच्छा है, अगर वो बाहम दरार रहने दे
main kh.ud se kinaara karke juda rahaa kh.ud se
achchha hai, agar wo baaham daraar rahne de

चश्म मेरी तर रहे उसने यही दुआ की थी
वो दुश्मन हुआ है’ दिल उस्तुवार रहने दे
chashm merii tar rahe usney yahii duaa kii thii
wo dushman huaa hai’ dil ustu’waar rahne de

वो नज़दीकियाँ रखता है भले ही मतलब से
लेकिन तू उसे मेरा ग़मगुसार रहने दे
wo nazdeekiyaa’n rakhta hai bhale hii matlab se
lekin tuu usey meraa ghamgusaar rahne de

वो मिलकर न मिल पाया है मुझे, ख़ुदा है क्या
आमद का ‘नज़र’ उसके इश्तिहार रहने दे
wo milkar na mil paaya hai mujhe, kh.udaa hai kya
aamad ka ‘Nazar’ uskey ishti’haar rahne de

बहर/Baher: 2112 1112 2212 1222

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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 20:12 29-08-2013
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 20:12 29-08-2013

तोड़कर दिल मेरा जा रहे हो कहाँ

तोड़कर दिल मेरा जा रहे हो कहाँ
इश्क़ की जुस्त-जू में है आहो-फ़ुगाँ
toR’kar dil meraa jaa rahe ho kahaa’n
ishq kii just-juu mein hai aaho-fugaa’n
17:57 25-08-2013

अब किसे देखना है तुझे देखकर
तू इबादत मेरी ‘ तू ही मेरा जहाँ
ab kise dekh’naa hai tujhe dekh’kar
tuu ibaadat merii ‘ tuu hi meraa jahaa’n
18:06 25-08-2013

देखना है तेरी जोत को रात-दिन
नूर में तेरे शामिल है ये कहकशाँ
dekh’na hai terii jot ko raat-din
noor mein tere shaamil hai ye kah’kashaa’n
18:13 25-08-2013

जान, सजदे बिछाऊँ तेरी राह में
शिर्क की बात करने लगे सब यहाँ
jaan, sajde bichhaa’uu’n terii raah mein
shirk kii baat karne lage sab yahaa’n
18:20 25-08-2013

अहद करना वही तुम निभाना जिसे
राह मुश्किल हुई ‘ अजल है इम्तिहाँ
ahed karnaa wahii tum nibhaanaa jise
raah mushkil hu’ie ajal hai imtihaa’n
19:04 25-08-2013

ये गुलों से लदी शाख़ मुरझा गयी
सब ज़ख़्म ख़ुशबू के हो गये उर्रियाँ
ye gulo’n se ladii shaakh. murjhaa gayii
sab zakh.m kh.ushboo ke ho gaye urriyaa’n
20:31 25-08-2013

आज़मा लो मुझे जीत या हारकर
पर न कहना कभी तुम मुझे बद्‌गुमाँ
aazamaa ko mujhe jeet yaa haarkar
par na kah’naa kabhii tum mujhe bad’gumaa’n
21:50 25-08-2013

ऐ ‘नज़र’ ज़िंदगी बाँटती है ख़ुशी
क्या बनोगे नहीं तुम मेरे राज़दाँ
ai ‘Nazar’ zindagi baa’nT-tii hai kh.ushii
kyaa banoge nahii’n tum mere raazdaa’n
21:56 25-08-2013

212 212 212 212
बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 21:56 25-08-2013