गिर जायेगा इस बरसात में घर

गिर जायेगा इस बरसात में घर
तुम हो उधर हम हैं इधर

जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा
जिस सिम्त दौड़ती है नज़र

न तुम हो मेहरबाँ न हक़ ही है
होता नहीं किसी पे दुआ का असर

ख़ाली दिल में साँसें बोझ लगती हैं
और मुसकुराये जाता है क़मर

अपनी मरज़ी के हम मालिक़ नहीं
तेरे कहे पे करते हैं सफ़र


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है
जिस सिम्त देखता हूँ दिल बदगुमाँ-सा है

दर्द को दर्द हो ऐसा होता नहीं
इसीलिए ख़ातिर में यह नौ-जवाँ-सा है

ख़ुदा ही मेहर से मैं रहा सदियों के फ़ासले पे
आज भी वह ना-मेहरबाँ-सा है

ढूँढ़ता हूँ मैं ख़ुद को उस गली में
जिसमें मुझे ज़िन्दगी होने का नुमाया-सा है

रोशनी में भिगो दिया शबे-महफ़िल को जिसने
तेरी रंगत का शुआ-सा है

एहसासात दफ़्न हैं किसी कब्र में
दर्द दिल का आज कुछ बे-ज़ुबाँ-सा है

खींच लिया जिगर को दाँतों से लब तक
आज महफ़िल में यह कमनुमा-सा है

तेरी दीद से बादशाहत मिली थी मुझे
ज़ख़्म कहता है तेरा साया हुमा-सा है

बदनसीबी गर्दिशे-अय्याम है बस
वक़्त यह एक इम्तिहाँ-सा है

तमाशा बहुत हुआ तेरे जाने के बाद
जो कुछ भी हुआ ज़ख़्मे-निहाँ-सा है

शज़र बेसमर हैं नकहते-गुल भी नहीं
मौसम यह ज़र्द ख़िज़ाँ-सा है

ज़ीस्त नवाज़ी गयी सो जी रहे हैं
मगर जीना मुश्किल मरना आसाँ-सा है

मैं गर तेरा तस्व्वुर करूँ
बूँद-बूँद शबनम का गिरना भी गिरियाँ-सा है

तुम नहीं गुज़रते इस राह से
मेरी गली का हर पत्थर रेगिस्ताँ-सा है

वह उजाले जिनसे चौंक गयीं थीं मेरी आँखें
मंज़र वह भी कहकशाँ-सा है

ना पूछ कब से तेरे दीवानों में शामिल हूँ
हाल मेरा भी कुछ-कुछ बियाबाँ-सा है

नीली शाल में लिपटी देखा था तुझे
तब से जाना कि चाँद किसी माहलक़ा-सा है

तुम आये घर मेरे आस्ताने तक
कि अब का’बा ही मेरे सँगे-आस्ताँ-सा है

इश्क़ में हमसा न पायेगा कोई
न होना मेरा उनकी बज़्म में हरमाँ-सा है

हम वस्ल की तमन्ना में मुए जाते हैं
ज़ुज तेरे सभी से वस्ल हिज्राँ-सा है

शगून तेरे देखने भर से होता था
आज इन आँखों में हर क़तरा टूटा-टूटा-सा है

बेज़ार है चमन तितली ज़र कैसे पिये
अब कि मौसम भी कुछ बेईमाँ-सा है

ज़हर हमको दिया दवा बता के ख़ुदा ने
ज़ीस्त जो बख़्शी यह भी सौदा-सा है

‘नज़र’ बातें हैं बहुत उसके इश्क़ो-ग़म में
जिसका दिल पर निशाँ-सा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दिल में फिर वही दर्द उठा है

दिल में फिर वही दर्द उठा है
तेरा हिज्र मौत से बड़ी सज़ा है

ये रक़ाबी माहताब की सर्द पेशानी
जैसे साँसों में बर्फ़ का टुकड़ा है

इक ख़ार चुभा है कब से सीने में
वो संगदिल आज मेरा ख़ुदा है

गुले-पलाश की तरह मेरा जीवन
जुदा ख़ुशबू से ताउम्र जुदा है

‘नज़र’ को जहाँ तुम छोड़ गये थे
वह आज भी उसी मोड़ पे खड़ा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

ज़िन्दगी माने हो तुम

ज़िन्दगी माने हो तुम
साँसें तुम्हारा एहसास हैं
यादें बाइस हैं ज़ीस्त को
तेरी तमन्ना है खु़शी
ग़म है तेरी जुदाई
ज़ख़्मे-दिल ही मरहम
ज़ख़्मे-दिल ही दवा
और चारागर हो तुम…

आप ही हँसना है
आप ही रोना है
दिन-रात ख़्यालों में
तुमसे बातें करना
सब जीने का मतलब है
खा़ली सीने में दिल कहाँ है
वह तो तुम्हारे पास है
जो सीने में धड़कता है
महज़ तुम्हारा एहसास है

जब भी बेले की कली खुलती है
और गुलाब महकता है
यूँ एहसास होता है उसे छूकर
जैसे तुमको छू लिया है
तुम मुझसे नाआश्ना हो
मगर मैं तुमसे दूर नहीं
यह दूरियाँ यह फ़ासले
सब कम हो जायेंगे
बस तुम्हारे घर का पता मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को

आज महसूस किया मैंने
गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ
तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी
कैसा महसूस करूँगा बाद उसके…

काँच-से कच्चे खा़ब किस तरह चूर होंगे,
किस तरह बिखरेंगे, छिटकेंगे मेरे ज़ख़्मों पर
मानिन्द काँच के टुकड़ों के…
अश्कों का खा़रापन किस तरह ज़ख़्मों से
मवाद बनके बहेगा
क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को
किसी लाश की तरह,
जिसे दर्दों की तह में
वक़्त की मिट्टी तले दबा दिया गया हो

आज महसूस किया मैंने एक डर
तेरी फ़ुरक़त का डर
तेरे दूर होने का डर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४