कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा

आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा
यह तीर जो मेरे दिल तक पहुँचा

ज़ख़्म देकर जो उसका जी न भरा
दिल उसका मेरे दिल तक पहुँचा

ख़ुशी की प्यास बढ़ती गयी जब
मैं भी दर्द के हासिल तक पहुँचा

धुँआ-धुँआ है आँख मेरी अब रोज़
कि मैं अपने ही साहिल तक पहुँचा

हक़= truth, righteousness


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में

नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में
मैं रंग-बिरंगे सपनों की छतरी लेके
साँवले का मन लुभाके, बिजली गिराके
राधा चली कहाँ ऐसे गगरी सँभाले

इठलाती है बल खाती है जिया जलाती है
राधा काहे साँवले से इतना इतराती है
हरी चुनरिया पवन जब उसकी उड़ाती है
गुलाबी बदन की भीगी धूप उड़ाती है

साँझ का घूँघट ओढ़े पनघट उतरती है
गगरिया छलकाती द्वार से निकलती है
सतरंगी छटा जो उसके रूप की बरसती है
मन की मरूस्थली उसके लिए तरसती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०५ जून २००३

जैसे-तैसे निभाते हैं

जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं
सच्चे-झूठे सपने तेरे
रातों की नींदें उड़ाते हैं

दो किनारे जिससे मिलते हैं
वह पुल टूट गया
बारिश बाढ़ बनी कि फिर
हाथों से हाथ छूट गया

उम्मीदें क्यों रखते हैं
जो अब रोये जाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं

रुसवाई कुछ और नहीं
एक झूठा बहाना है
क्यों करते हो वादे जिनको
बेमानी हो जाना है

कैसे-कैसे लोग यहाँ
जो बस अपनी सुनाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दिल की बस्तियाँ जलीं

दिल की बस्तियाँ जलीं पर उठा नहीं धुँआ
बुझाया आँखों से मैंने पर बुझा नहीं धुँआ

बहुत देर तक टीस दबाये बैठा रहा मैं
चंद अश्क जो आये फिर चुभा नहीं धुँआ

दर्द पर्त-दर-पर्त जमता ही रहा
बुझाया बहुत मैंने पर हुआ नहीं धुँआ

कुछ उम्मीदें अश्कों के साथ बह गयीं
अश्क जो आँखों में आये फिर रहा नहीं धुँआ

पलकें बंद करता था पर होती न थीं
बहुत बाँधा किनारों से पर बँधा नहीं धुँआ

हम क्या-क्या कहें ‘नज़र’ तुम ही कह दो
मैंने आँखों में छुपाया पर छुपा नहीं धुँआ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १७ अगस्त २००४