यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको

यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको
तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको

ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं
मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से
किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे
जिस तरह से छुआ है तूने मुझको

मैं बहुत भटका हूँ चेहरे-चेहरे
और हर दिल को झाँककर देखा है
तेरे दिल-सा नादाँ और मासूम
कोई दूसरा दिल न मिला है मुझको

तू मुझसे दूर बहुत दूर सही लेकिन
बहुत पास है धड़कते हुए दिल के
यह वही शाम है याद तो होगा
जब आँखों में लिया था मैंने तुझको

मेरे नाम से रोशन जलता हुआ शायद
कोई चराग़ तो होगा तेरे दिल में
क्या तूने तन्हाई से मज़बूर होके
आज फिर से याद किया है मुझको


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तेरी जगह कौन ले सकता है

तेरी जगह कौन ले सकता है मेरे जीवन में
तुम ही तो थी तुम ही तो हो मन आँगन में

सपनों की पुरवाइयाँ तेरा बदन को छूती थीं
तेरे रूप की कहानी नित मुझसे कहती थीं
आज भी वह सारे सिलसिले सब वैसे हैं
गीली राहों की गीली-गीली मिट्टी के जैसे हैं

आज भी तेरे द्वार खड़ा हूँ मैं तेरी लगन में
तेरी जगह कौन ले सकता है मेरे जीवन में
तुम ही तो थी तुम ही तो हो मन आँगन में

मुझको प्यार सिखाने वाली प्रिय तुम कहाँ हो
मेरे मन की उत्कंठित अभिलाषा तुम कहाँ हो
काली रातों को चंद्रप्रभा के दर्पण दिखा दो
मेरे जीवन को एक नयी सुगन्धित सुबह दो

आज भी जल रहा हूँ मैं बिछोह की अगन में
तेरी जगह कौन ले सकता है मेरे जीवन में
तुम ही तो थी तुम ही तो हो मन आँगन में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०५ जून २००३

ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
ऐसा यह क्या हो गया अन्जाने
दिल मेरा क्यों टूट गया रब जाने

तुम गये तन्हा हो गयी ज़िन्दगी
तुम गये दिल से गयी हर ख़ुशी
हर लम्हा तू मुझे याद आ रही है
याद आ के मुझे तड़पा रही है

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले

यारा, तेरे चाहने वाले हम हैं
मेरे दामन में कितने ग़म हैं
कैसे रहते हैं हम यहाँ ज़िन्दा
जैसे साहिल पे मिट्टी का घरौंदा

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
तू आ कभी देख ले मेरी बेख़ुदी
तू आ कभी लौटा दे मेरी ज़िन्दगी

यारा तू ज़िन्दगी, तू है ज़िन्दगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

मैं खु़द को दो बाँहों में भरकर

तुम्हें देखता हूँ तो
तुम्हारी मासूम हँसी से यूँ लगता है कि
तुम मुझे चाहती हो
इन चंद लम्हों में मुझे
यह महसूस होता है शायद
तुम मेरे लिए बनी हो

तुम्हारे रूप का जादू मुझे
तुम्हारी तरफ़ खींचने लगता है
दुनिया थम-सी जाती है
मन बहकने लगता है
जिस्म की सौंधी मिट्टी महक उठती है
तुम्हारी खु़श्बू के साथ…

तुम्हारी अदा तुम्हारा तस्व्वुर
मेरे मन से जाता ही नहीं
मैं खु़द को दो बाँहों में भरकर
बैठा रहता हूँ देर तलक
तुम्हारी याद दिल में पाज़ेब छमकाती रहती है…

तुम्हारा नाम चाँदनी है ना!
मुझे अपनी बाँहों में भर लो तुम
यह उदासी के अँधेरे छँटते नहीं अब…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४