हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ

हर गली में ढूँढ़ा तेरा निशाँ
मैं भटकता रहा यहाँ-वहाँ

बेताब है हर लम्हा नज़र
उतरे न इश्क़ का ज़हर

प्यास है तेरे दीदार की
चाहत है तेरे एतबार की

रुख़ पे ज़ुल्फ़ परेशान है
अधूरी तेरी-मेरी दास्तान है

तस्वीरें तेरी चुनता रहा
रोज़ नये ख़ाब बुनता रहा

तस्वीरों से बात करता हूँ मैं
प्यार तुमसे करता हूँ मैं

संगदिल से इल्तिजा की
ख़ुदा से तेरे लिए दुआ की

किस दर पे न माँगा तुम्हें
अब तक क्यों न पाया तुम्हें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ

माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ
हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ
आपको कहूँ तो आख़िर मैं क्या कहूँ

आपका हुस्न तो बेमिसाल है
रूप, रंग, अदा का विसाल है
उन्तिस चाँद में भी दाग़ है
आपका बदन रेशमी आग है

इस रेशमी आग को कहूँ तो क्या कहूँ
हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ

हुस्न आपका सबसे आला है
रब ने किस साँचे में ढाला है
चाँदनी में खिला हुआ कँवल हो
मुझको अल्लाह का फ़ज़ल हो

अल्लाह के फ़ज़ल को नाम क्या दूँ
माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३१ मई २००३

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

दरख़्त की शाख़ों पर
धूप की बूँदें नहीं
सूरज का दरिया है

छोटी-छोटी
नन्हीं मासूम बेलें
शाख़ों से खुलकर
तड़फड़ाने लगीं…

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

पाँव सूखे थे
ज़मीं ने सोख लिये
मुड़के देखा तो
निशाँ कहीं न थे

रात आयी तो
चाँद बरसने लगा
सहर फिर मुझे
आज़माने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २५ अप्रैल २००३

हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे

हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे
रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे

बेवफ़ा गर वह होता दर्द शायद कम होता
उसकी वफ़ा का भेद यूँ खुलेगा यह न जानते थे

एक-एक साँस से दबके हूक पत्थर हो गयी
संगे-शरर से जल जायेंगे यह न जानते थे

हमें ज़ब्रो-ज़ोर से किसने ठगा सरे-राह
दोस्ती करके ठगे जायेंगे यह न जानते थे

देख तो ‘वफ़ा’ अपने ख़ाली वीरान दिल में
दाग़ वही सुलगता है जिसको अपना जानते थे


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३