ख़ुद-फ़रेबी हूँ

मैं बारहा जज़्बाती होकर क्यों उसका ज़िक्र कर देता हूँ? क्यों ये तूफ़ान दिल में थमकर नहीं रहता? क्यों ये सुनाना चाहता हूँ कि उसने मेरे साथ क्या किया? क्यों आख़िर क्यों ये सब मेरे साथ हो रहा है? उसे भूल जाता हूँ, मगर जब उसका चेहरा मुझे एक उदासी के पीछे ख़ामोशी से ढका हुआ दिखता है, तो क्यों, उसकी उतरी हुई सूरत मुझसे कुछ कहने की कोशिश करती है? क्यों ये हर दफ़ा महसूस होता है मुझे… जब मेरी नज़र उससे बचती है तो उसकी नज़र मुझे पकड़ लेती है? क्यों ये मालूम होता है कि जिस तरह से मैं उसे नज़र अंदाज़ करता हूँ वो करके भी नज़र अंदाज़, मुझे देखती है? अगर उसे इस ‘क्यों’ का जवाब मालूम है तो क्यों वो मुझे नहीं देती? वो उस हर एक शख़्स से बात करती है जिससे मैं करता हूँ मगर क्यों जो कहती है उनसे… मुझे देखकर कहती है, दिखाकर कहती है? वो आज उस हर एक से बात करती है जो उसे बुरा कहते थे, क्यों आज उस हर एक के पास बैठती है जो आज भी उसके बारे में बुरा सोचते हैं?

उसकी एक सहेली ऐसा लगता है कि मुझसे कुछ कहना चाहती है, अगर नहीं तो क्यों… इतना ग़ौर से देखती है मेरी जानिब? मैं इतना भी कठोर नहीं जितना वो मुझको समझती है। नहीं मैं नहीं जानता कि वह अगर मुझसे आकर बात करे तो मैं उससे क्या कहूँगा क्योंकि मैं ख़ुद से अजनबी, ख़ुद-फ़रेबी हूँ, अगर मैं ऐसा हूँ तो क्यों हूँ?

[Dead Letter] about MV
Penned on 31 दिसम्बर 2004

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं
चाहने वाले बाज़ार में बिकते नहीं हैं

ख़ुद से पराया ग़ैरों से अपना रहे जो
ऐसे लोग एक दिल में टिकते नहीं हैं

सूरत से जो सीरत को छिपाये फिरते हैं
वो कभी सादा चेहरों में दिखते नहीं हैं

होता है नुमाया दिल को दिल से, दोस्त!
मन के भेद परदों में छिपते नहीं हैं

इन्साँ है वह जो जाने इन्सानियत
हैवान कभी निक़ाबों में छिपते नहीं हैं

वक़्त में दब जाती हैं कही-सुनी बातें
हम कभी कुछ दिल में रखते नहीं हैं

पलटते हैं जो कभी माज़ी के पन्नों को
ये आँसू तेरी याद में रुकते नहीं हैं

नहीं मरना आसाँ तो जीना भी आसाँ नहीं
चाहकर मिटने वाले मिटते नहीं हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको

यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको
तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको

ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं
मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से
किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे
जिस तरह से छुआ है तूने मुझको

मैं बहुत भटका हूँ चेहरे-चेहरे
और हर दिल को झाँककर देखा है
तेरे दिल-सा नादाँ और मासूम
कोई दूसरा दिल न मिला है मुझको

तू मुझसे दूर बहुत दूर सही लेकिन
बहुत पास है धड़कते हुए दिल के
यह वही शाम है याद तो होगा
जब आँखों में लिया था मैंने तुझको

मेरे नाम से रोशन जलता हुआ शायद
कोई चराग़ तो होगा तेरे दिल में
क्या तूने तन्हाई से मज़बूर होके
आज फिर से याद किया है मुझको


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

प्यार में

पहली नज़र में हो जाता है
यह दिल खो जाता है, प्यार में
कुछ भी होश नहीं रहता है
जहाँ बेग़ाना लगता है, प्यार में

शबो-रोज़ दर्द नये उठते हैं
फूल रंग-बिरंगे खिलते हैं
दीवानों के जैसे हाल होता है
उसी का ख़्याल आता है, प्यार में

यादों की धूप कड़ी हो जाती है
चेहरे की चाँदनी मन लुभाती है
ख़ाबों का झरना-सा बहता है
हर पल नया लगता है, प्यार में

चाँद से हसीं और क्या होगा
उस जाने-मन का चेहरा होगा
यह दिल उसी को ढूँढ़ता है
जो दिल को लूटता है, प्यार में

उसके लिए मरता है दिल
जिसके लिए धड़कता है दिल
हसीनों में वह हसीं लगता है
जो दिल में बसता है, प्यार में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मेरी रूह को तख़लीक़ करके

मेरी रूह को तख़लीक़ करके
किस राह में खो गये हो तुम
लफ़्ज़ मेरे अजनबी लगते हैं
जाने किसके हो गये हो तुम

दिन की धूप की पीली चादर
जला करती है सारा-सारा दिन
रात की राख अंगारों के साथ
सुलगा करती है तुम्हारे बिन

उलझे-उलझे ख़्याल आते हैं
उलझे हुए ख़्वाब में डूबा हूँ
ग़म पी रहा है घूट-घूट मुझे
जीते-जी इस क़दर टूटा हूँ

मेरी रूह को तख़लीक़ करके
किस राह में खो गये हो तुम
लफ़्ज़ मेरे अजनबी लगते हैं
जाने किसके हो गये हो तुम

जब भी रात में शग़ाफ़ आता है
खिलती सहर के उफ़क़ दिखते हैं
कितने ही ख़ूबसूरत क्यों न हो
तेरे लबों से कम सुर्ख़ दिखते हैं

ज़हन की गलियों में ही खोया हूँ
तेरे लिए भटकता हूँ दर-ब-दर
तक़दीर के बे-रब्त टुकड़े हैं कुछ
जिनको समेटता हूँ आठों पहर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४