वह जब भी इस गली इस डगर आये

वह जब भी इस गली इस डगर आये
मेरी ज़िन्दगी की सहर1 बनकर आये

शबो-रोज़2 जलता हूँ मैं इन अंधेरों में
वह मेरे लिए कुछ रोशनी लेकर आये

आया था पिछली बार अजनबी बनकर
अब कि बार वह मेरा बनकर आये

हूँ बहुत दिनों से शाम की तरह तन्हा
कोई मंज़र-ए-सोहबत3 नज़र आये

दरवाज़े पे खड़ा हूँ इक यही आस लिये
वह मेरी बे-सदा4 आह सुनकर आये

मंदिर-मस्जिद जाकर सर नवाया5
अब तो मेरी दुआ में कुछ असर आये

खिले हैं गुलशन में हर-सू6 गुल-ही-गुल
वह आये तो मेरा चेहरा निखर आये

मुद्दत से देखी नहीं शुआहा-ए-फ़ज़िर7
आँखें खोलूँ गुलाबी मखमली सहर आये

शफ़क़-ओ-उफक़8 के रंग कैसे देखूँ
मेरी आँखों में कोई पुराना मन्ज़र आये

मैं तंग गलियों में तन्हा-सा फिरता हूँ
क्यों मेरे ख़ुदा को रहम मुझ पर आये

या दिल यह धड़कना बंद कर दे मेरा
या इस दिल पर मुझ को ज़बर9 आये

तुझे भेजूँ किस पते पर पयाम10 अपना
कि मुझ तक मेरी कुछ ख़बर आये

मैंने नहीं बदला अपना घर आज तक
उम्मीद कि वह शायद कभी घर आये

मिलें उसको हर तरह से ख़ुशियाँ हमेशा
और उस की हर बला मेरे सर आये

है बहुत प्यासी यह ज़मीन-ए-दिल11
कभी मुझ पर भी बारिश टूटकर आये

ऐ ‘नज़र’ उस को कुछ न कहे दुनिया
हो यह कि हर इल्ज़ाम मुझ पर आये

शब्दार्थ:
1. सुबह; 2. रात और दिन; 3. दोस्ती का मंज़र; 4. मौन; 5. सर झुकाया; 6. सभी ओर; 7. भोर की (लालिमा युक्त) किरणें; 8. सुबह और शाम (के आकाश का गुलाबी रंग); 9. नियंत्रण; 10. संदेश; 11. दिल रूपी पृथ्वी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

वह दिल में एक मस्जिद है

वह दिल में एक मस्जिद है
जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ
वह मन मन्दिर की देवी है
जिसकी साँझ-सवेरे पूजा करता हूँ

मैं ख़तावार हूँ गुनाहे-इश्क़ का
उसके दर पे रोज़ सजदे करता हूँ
वह संगदिल है नरम दिल भी
अपनी जान उसके सदक़े करता हूँ

मैंने उसके नाम से जीना जाना है
मैं बेपनाह उससे मोहब्बत करता हूँ
सारे जहाँ में वह ख़ुदा है मेरा
मैं सिर्फ़ उसकी अक़ीदत करता हूँ

मैं तलबगार हूँ उसके दिल का
अपना यह दिल उसके नाम करता हूँ
वह सिर्फ़ो-सिर्फ़ मेरा है बस
मैं हर मुक़ाबिल को पैग़ाम करता हूँ

” कोई एक भी नहीं मुझसा ज़माने में
  एक दौर गुज़ार दोगे आज़माने में
  हर हाल में जीतना मेरी फ़ितरत है
  सौ उम्र लगा दोगे मुझको मिटाने में “


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

रोज़े-शामे-दीवाली कोई नूरे-चराग़ नहीं

रोज़े – शामे – दीवाली   कोई   नूरे – चराग़  नहीं
चौखट   सूनी   दिल   वीराँ   तन्हा – तन्हा  रहता है

पलकों पर शबनम के क़तरे फीका-फीका चाँद
और गली में सब सूखा-सूखा बंजर-सा रहता है

न   फूल   नकहता   है   न   कोपल   कोई खुलती है
गुलाबी बेलों पर सब बेरंग ख़ुश्क – सा रहता है

काली रातों-सी तेरी लटें वो जिनमें जी उलझा था
उनका तो अब आँखों पर कुछ साया-सा रहता है

मज़ा कहाँ अब आतिश में कहाँ पटाखों में वो धूम
मेरे कानों में सन्नाटा-सा कुछ चीखता रहता है

मंदिर में जब हाथ जोड़कर मेरा सिर झुकता है
मेरा   यह   मन  बस   तुमको   ही   माँगता   रहता   है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३