अश्क से पहले आँच उठती है

अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है

बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है

थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है

निगेबाँ है मेरा पहला इश्क़
तो फ़िक्र मुझको ख़ाक चखती है

गर वह सोचे अश्क बुझते नहीं
रूखी-रूखी आँख मेरी हँसती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

आँखों में आँसू नहीं आते

आँखों में आँसू नहीं आते
क्योंकि मैं जानता हूँ
तुम लौटकर आओगी ज़रूर
यह दिल तन्हा कहाँ है
इसमें यादें हैं तुम्हारी
तुम रहो कितने भी दूर

देखता हूँ तुम्हें
जब भी आँखें मूँद लेता हूँ
और कोई कहाँ है इनमें हुज़ूर
तुमसे प्यार किया है
यह दिल का सौदा है तुम्हीं से
क्यों न रहूँ थोड़ा मग़रूर

पास आने के दिन आ गये
धड़कनों में बेक़रारी है
दिल में सुरूर ही सुरूर
वादियों में चले मौसम हरे
डालियों पर फूल गुलाबी हैं
निगाह में भर गया है नूर

जादू-सा है फ़िज़ाओं में
खिल रहे हैं ख़्याल हर-सू
क्यों न आये तुम्हारा मज़कूर
दिल बहलता नहीं बातों से
यह कैसा सिलसिला है
चैन आये गर आये वह हूर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दीप जलाओ रात को पूनम कर दो

दीप जलाओ रात को पूनम कर दो
मेहबूब की यादों से आँखें नम कर दो

तमन्ना को हसरते-विसाल है
ज़हर दे दो मुझे यह करम कर दो

शाम की ख़ाक गिरने लगी है आसमाँ से
मेरे ख़ातिर में सहरे-ग़म कर दो

बर्फ़ की गरमी से आजिज़ आ चुका मैं
बे-तस्कीनियों की धूप गरम कर दो

चाँद के छुपने का बाइस मैं कैसे कहूँ
‘वफ़ा’ आज बरसात का मौसम कर दो


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

तू संग न होगा

तू कर यह वादा भी मेरे अल्लाह तू संग न होगा
तू है भी अगर किसी बुते-संग में तू संग न होगा

तेरी मर्ज़ी से यह गुलशन वीरानो-गुल्ज़ार हैं
मैं दुआ करूँगा दमे-आख़िर तक तू संग न होगा

मेरी क़िस्मत में क्या बदा है एक तू ही जानता है
गर हुआ कभी मेरी दुआ का हश्र तू संग न होगा

जुज़ मेरे हर मुक़ाम पर इक मुक़ीम दिखता  है
मैं तन्हा खड़ा हूँ कब से राह में तू संग न होगा

मत कर फ़िक्र मेरे ‘वफ़ा’ यह तेरा अंजाम नहीं
दिल दुखते-दुखते भी कहता रहा तू संग न होगा

इस ग़ज़ल में संग एक उर्दू अल्फ़ाज़ है जिसका अर्थ पत्थर होता है|


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३