यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

एक तसल्ली

एक तसल्ली मेरे पाँव के नीचे से गुज़रती है
कितनी पी है तूने जो मेरी आवाज़ लरज़ती है

यह भी कोई ग़म है कि तेरा कोई यार नहीं
मेरा तो उसके अफ़साने में कोई किरदार नहीं
तू आज भी परछाइयाँ चुनता है दीवारो-दर
आज भी नब्ज़ की चुभन मुझको अखरती है

एक तसल्ली मेरे पाँव के नीचे से गुज़रती है…

तेरी बाँहों में रेशमी रातों का रेशमी चाँद होगा
मगर कौन दूसरा हमपे मेहरबान होगा
तू आज और कल मेरा मुक़ाबिल नहीं है अगर
फिर क्यों मेरी क़िस्मत मुझको परखती है

एक तसल्ली मेरे पाँव के नीचे से गुज़रती है
कितनी पी है तूने जो मेरी आवाज़ लरज़ती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २७ मई २००३

तुमको नफ़रत है मुझसे

तुमको नफ़रत है मुझसे मुझको क़रार है तुमसे
तन्हा मिलो मुझसे कभी’ कहूँ प्यार है तुमसे

तुम चलते हो मुझसे मुँह फेर के जाने किस बात पे
हालत मेरी नीयत दिल की असरार1 है तुमसे

ज़माने भर के काम आज निपटाने हैं मुझ एक को
तुम साथ दो निपट जायेंगे इक़रार है तुमसे

बहुत पाक था दिल मेरा बहुत पाक है आज भी
तुम कहते हो गुनाहगार तो गुनाहगार है तुमसे

तुम्हारे सर आज़माइशो-इम्तिहाँ का भूत है
हम हैं तेरे तालिब2 दिल तलबगार है तुमसे

हम तो डूबे हैं सर से पाँव तक तेरे इश्क़ में
इश्क़ मेरा सबा में बहता है जो नमूदार है तुमसे

शब्दार्थ:
1. secret, भेद; 2. willing(person), इच्छुक


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं

इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं
दीजिए अगर आपको इल्ज़ाम देने हैं

और कौन दूसरा सितम-परस्त होगा इतना
आपकी न पर भी मुझे पयाम देने हैं

आपकी नीम-नज़र देती है मुझको सौ ग़ालियाँ
बावजूद इसके मुझे सौ सलाम देने हैं

संग उठाते-उठाते न थक जायें हाथ कहीं
आपको अभी मुझे ज़ख़्म तमाम देने हैं

‘नज़र’ से पूछ सुम्बुल के दिये हुए ज़ख़्म
आज काफ़िर को तर्क़े-इस्लाम देने हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

इक मौक़ा दो तुम मुझे

इक मौक़ा दो तुम मुझे
कि बता सकूँ
कितना टूटकर प्यार करता हूँ तुमसे

तुम्हें जो चाहिए
सब दूँगा मैं
प्यार, दिल, जाँ, दौलत सब कुछ
शैदाई हूँ तुम्हारे पीछे
जान दे भी सकता हूँ
और ले भी सकता हूँ

तुम मेरी मोहब्बत ही नहीं
मेरी प्रार्थना भी हो
दुआ में हर बार
तुम्हें ही माँगा है मैंने
सच्चे दिल से…

जब चाहो आज़मा लो मुझे
मैं भँवरा नहीं
जो कली-कली मण्डलाता फिरूँ
तुमसे प्यार करता हूँ
कहके देखो सीना चीर दूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४