Mushy thoughts are chasing my way

Mushy thoughts are chasing my way
There’s no more to happen on
Elsewhere find the words to say
Mushy thoughts are chasing my way

I’m learning how to live happy
It’s too tough to be a raspy
I wanna go through a new day
Mushy thoughts are chasing my way

There’s no more to happen on
Elsewhere find the words to say

Simplicity decipher myself, what I am?
An unbound desire That’s my name
And tracing a very new day
Mushy thoughts are chasing my way

There’s no more to happen on
Elsewhere find the words to say

Wrap all my pain in a paper
In my heart may you be the zephyr
In this love I am not a lay
Mushy thoughts are chasing my way

There’s no more to happen on
Elsewhere find the words to say


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

आँखों में आँसू नहीं आते

आँखों में आँसू नहीं आते
क्योंकि मैं जानता हूँ
तुम लौटकर आओगी ज़रूर
यह दिल तन्हा कहाँ है
इसमें यादें हैं तुम्हारी
तुम रहो कितने भी दूर

देखता हूँ तुम्हें
जब भी आँखें मूँद लेता हूँ
और कोई कहाँ है इनमें हुज़ूर
तुमसे प्यार किया है
यह दिल का सौदा है तुम्हीं से
क्यों न रहूँ थोड़ा मग़रूर

पास आने के दिन आ गये
धड़कनों में बेक़रारी है
दिल में सुरूर ही सुरूर
वादियों में चले मौसम हरे
डालियों पर फूल गुलाबी हैं
निगाह में भर गया है नूर

जादू-सा है फ़िज़ाओं में
खिल रहे हैं ख़्याल हर-सू
क्यों न आये तुम्हारा मज़कूर
दिल बहलता नहीं बातों से
यह कैसा सिलसिला है
चैन आये गर आये वह हूर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

नग़मे खिलने लगे हैं

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है

दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है

साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

साहिबा ज़ुलेख़ा सोफ़िया

साहिबा ज़ुलेख़ा सोफ़िया आँखों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू

जानाँ मैं तेरे हुस्न का ख़्वार हूँ
तेरी इक झलक को बेक़रार हूँ
तेरे लिए दर-ब-दर भटकता रहा
रात-दिन तेरा नाम रटता रहा

मेरे दिल के अँधेरों में उजालों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू

यूँ ही दूर से देखूँ कब तलक तुझे
अपनी आँखों में बाँहों में छुपा ले मुझे
तेरे प्यार को ज़रा प्यार करने दे
इक़रार करके इज़हार करने दे

ज़हन के तस्व्वुर में सवालों में तू
ख़ाबों में ख़्यालों में मेरी साँसों में तू


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १२ मई २००३

जब पतझड़ के मौसम आते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले झड़ जाते हैं
जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले गिर जाते हैं
पत्ते वह फिर से वापस आते हैं
पेड़ों पर फिर से वापस आते हैं
फूलों के गुच्छे हवा में लहराते हैं
आते-आते दिल क़रीब आते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

परवाने शमअ पर मर मिटते हैं
आशिक़ ऐसे कहाँ कब मिलते हैं
दीवाने शमअ पर मर मिटते हैं
साहिब, ऐसे कहाँ अब मिलते हैं
होते हैं उजाले मिटते जाते अँधेरे
दो दिल मिल जायें होते हैं सवेरे
दिए जलते हैं व गुल खिलते हैं
लम्हे रुकते हैं, ख़्याल बहते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९