How far we are

How far we are
How close we would be
Eyes are filled with mist
How clear could be

Drizzle is damping my mind
I’m floating in wet wind
But don’t seek sympathy

Eyes are filled with mist
How clear could be

Moon is at the edge of eve
Not a thread reamins to weave
To everything I’m ready

Eyes are filled with mist
How clear could be

Vivid eyes are getting dim
not because of any whim
Sores are again gory

Eyes are filled with mist
How clear cold be

Tender heart is feeling ill
Hoping for the last will
Where’s the majesty

How far we are
How close we would be
Eyes are filled with mist
How clear could be


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में
टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है

तुम नहीं मेरे साथ तो ज़िन्दगी एक अंधेरी ख़ला है!

बारहा: Several times


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

हर गाम इक मंज़िल है

ज़िन्दगी तेरे साथ से क्या मिला जुज़1 तन्हाई के
हर गाम2 इक मंज़िल है लोग मिले रुसवाई के

अब भरोसा ही उठ गया दुनिया के लोगों पर से
अहले-जहाँ3 कब क़ाबिल थे सनम तेरी भलाई के

चाक जिगर यूँ फड़का कि तड़प के फट गया
ऐजाज़े-रफ़ूगरी4 कैसा तागे टुट गये सिलाई के

वो फ़ज़िर5 के रंग वो शाम का हुस्न अब कहाँ
चंद कुछ निशान थे सो मिट गये तेरी ख़ुदाई के

हिज्र6 के रंग में सराबोर7 हैं अब मेरी रातें
काँटों के बिस्तर पे बिताता हूँ अब दिन जुदाई के

करवटें बदल-बदल के मेरी रातें गुज़रती हैं
नसीब नहीं अब मुझे हुस्न तेरी अँगड़ाई के

शब्दार्थ:
1. मात्र; 2. क़दम; 3. दुनिया वाले; 4. रफ़ूगरी का जादू; 5. भोर; 6. विरह; 7. भीगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

है जो किसी से तुम्हें तो गुल से निस्बत है
तुम मुझको मिले हो यह मेरी क़िस्मत है

तेरे तब्बसुम से ही है यह रंगे-बहार
लगता है अब जैसे सारी फ़िज़ा जन्नत है

तेरी आँखों की गुलाबी डोरियाँ जैसे नश्शा-ए-मै
तिश्ना-लब हूँ मुझे पीने की हसरत है

तेरी ज़ुल्फ़ों से गुज़रते देखी है मैंने सबा
हाए! यह सबा भी कितनी खु़श-क़िस्मत है

तेरे अबरू मानिन्दे-कमान उठते हैं
मुझको तेरे आगोश में मरने की चाहत है

तेरे लब हैं की पंखुड़ियाँ गुलाब की हैं
इक बोसा पाने को शबो-रोज़ की मिन्नत है

सुना है जन्नत की हूरों के बारे में बहुत
मगर उनमें कहाँ यह कशिशे-क़ामत है

देखा है तुमने कभी चाँद को सरे-शाम
एक वही है जो तेरी तरह खू़बसूरत है

हो तुम ही मानिन्दे-खु़दा मेरे लिए
इस दिल में तेरे लिए सच्ची अक़ीदत है

तुम क़रीब होते हो दर्द मिट जाते हैं
तुमसे ही मुझको होती नसीब फ़रहत है

तुम्हें देखा तो मैंने अपनी ज़िन्दगी देखी
तुमको चाहना ही खु़दा की इबादत है

मेरा दिल जितना चाहता है तुमको सनम
तुम्हें भी मुझसे उतनी ही मोहब्बत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६/०७/२००४

तुम्हारी तलाश

अजब जाला है डोरियों का
एक डोर का छोर
जाने और कितनी डोरियों से जुड़ा है…
डोरियाँ कुछ मानूस
जानी-पहचानी-सी मगर फिर भी अंजान
जाने मुझसे उलझ जायें
या सुलझा दें मुझे
जो भी हो
मुझे तो उनसे इक बार बँधकर खुलना ही है
चाहिए तो बस इतना
कि उस डोर की छोर तक पँहुचू
जिससे गींठ बँधनी है
कोई डोर मुझसे उलझेगी
कटेगी… टूटेगी…
मुझे इसकी क्या फ़िक्र…
हाँ जो मुझे सही डोर तक पँहु्चा दे
उससे जुड़ा रहूँगा किसी न किसी डोर के ज़रिये
मगर देखिए
वक़्त के किस सिरे पर
सही डोर से चाह की गींठ लगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४