ख़ुशबू के आइने ने

ख़ुशबू के आइने ने
मेरे चेहरे पर धूप बिछा दी
जो बात भूल गया था
एक बार फिर याद करा दी

वक़्त ने आवाज़ दी
ऐ ज़िन्दगी आज फिर हैराँ हूँ
कल तक मैं क्या था
सोचो तो आज मैं कहाँ हूँ

सूखे हुए लफ़्ज़ हैं
अब नज़्म की बात क्या होगी
बहार के पुरज़ों ने
अब ज़र्द ख़िज़ाँ को विदा दी

तेरा रेशमी उजला
आइने-सा रुख़ न भूल पाऊँगा
मैं गुज़र रहा हूँ
पर बीती गली न लौट पाऊँगा

अब्र गुज़रे सहरा से
वक़्त की रेत उसने भिगा दी
शज़र की प्यास बुझे
किसने उसको मिराज़ दिखा दी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

इक दिन तू चली जायेगी

मेरी जान न कर मुझसे मोहब्बत इतनी
कि इक दिन तू चली जायेगी
एतबार मैं तेरा कर तो लूँगा
मगर इक दिन तू चली जायेगी

ख़ूबसूरत यह दिन, हसीन यह पल
साथ जो तेरे मैंने गुज़ारे हैं
सारे जहाँ की चाहत है इनमें
और यह सब तुम्हारे हैं, सब तुम्हारे हैं

मैं वही दरख़्त हूँ
जिस पर मौसम आते रहे, जाते रहे
इक बहार की तरह तू भी आयी है
और इक दिन तू चली जायेगी

कोई वादा न कर तू रुकेगी ज़हन में
यादों की इक आँधी इक तूफ़ान की तरह
चले जाना तेरी उल्फ़त की तक़दीर है
माना मेरे साथ है तू हमसफ़र की तरह

मैं वही बादल हूँ
जिसकी बाँहों में छिपता है चाँद कभी-कभी
बिल्कुल चाँद की तरह तू भी आयी है
और इक दिन तू चली जायेगी

मेरी जान न कर मुझसे मोहब्बत इतनी
कि इक दिन तू चली जायेगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

‘नज़र’ वह हस्ती’

‘नज़र’ वह हस्ती’ उदू उसका’ उसका नाम रटे
जो लिख दे वह नाम दिल पर कभी न मिटे
जीता है भला कौन अदू उसका उससे लड़कर
वह आँधी है जिससे बरगद का दरख़्त फटे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

दरख़्त की शाख़ों पर
धूप की बूँदें नहीं
सूरज का दरिया है

छोटी-छोटी
नन्हीं मासूम बेलें
शाख़ों से खुलकर
तड़फड़ाने लगीं…

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

पाँव सूखे थे
ज़मीं ने सोख लिये
मुड़के देखा तो
निशाँ कहीं न थे

रात आयी तो
चाँद बरसने लगा
सहर फिर मुझे
आज़माने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २५ अप्रैल २००३