सहने दे ग़म थोड़ा-थोड़ा

सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा
जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा

जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा
रहने दे आँखों को भरा-भरा

सपने सारे मेरे टूटे
जो साथी तुम मुझसे रूठे

मरना गर मेरा वफ़ा हो
तो मेरी जान क्यों ख़फ़ा हो

आना तो न जाना तुम कभी
तुमसे हैं मेरी जाँ ख़ाब सभी

साँसें बन जाओ ख़ाली सीने की
प्यास दे जाओ जीने की

दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है

ये लम्हे रोक लो तुम
फिर न आयेंगे हुए जो ग़ुम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है

यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, लेकिन
कभी-कभी सितारों के टुकड़े भी गुज़रते हैं इधर से

मैंने उसका दिल तोड़ा था पर उससे कुछ माँगा नहीं!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वक़्त का पहना उतार आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये

ख़ाबों में सही अपना तो माना
दिल को मेरे अपना तो जाना

खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं

ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल
दिल को उसके दर पे छोड़ आये

तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या

दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं

ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल
महफ़िलों से उठके चले आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

अंधी ख़ला में

हमने तो कभी दिल की अंधी ख़ला में
किसी चाँद को रोशन होते नहीं देखा

शायद आतिशी इंतकाल था सितारे का


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी

तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी
कोई यूँ ही तो ख़ुद इतना फ़ुर्त नहीं होता है
लम्हा-लम्हा ख़ला-सी आँखों में क्या बदलता है?
कोई चेहरा आता है आँखों में आकर फिसलता है

बड़ा अजनबी जाना हमको जो सामान लौटा रहे हो
क्या रु-ब-रू होने वालों से कोई अजनबी होता है
मुतमइन-सा हूँ खु़द से, तेरा भी कसूर क्या है?
इस जहाँ में इक मेरे साथ ही ऐसा होता आया है

ज़बाँ से चखा है, जबसे तेरा नाम, हाँ तुम्हारा!
मुझे मिसरी की मिठास वह लज़्ज़त याद आयी नहीं
मेरी ज़ुबाँ का लहज़ा हर वक़्त खु़शनुमा रहता है
लोग कहते हैं मैं बदल गया हूँ, तुमने बदल दिया है

बेरब्त मेरी तक़दीर थी उसने तुमसे राब्ता पा लिया है
तेरे क़रीब होने से यह धुँध आँखों में भरा रहता है
तुम जब मेरे पास आकर बैठती हो लोग ताने कसते हैं
तुम्हें यह पता नहीं या तुम भी उन्हीं में शामिल हो?


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२