शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के

शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के
न क्यों फिर खिले, गुल दो दिलों के

यह उम्र जायेगी तेरे लिये ज़ाया
गर यह फ़ासले रहे यूँ ही मीलों के

तुम नहीं तो चाँदनी उदास रहती है
सब ताज़ा कँवल सूख गये झीलों के

ज़ब्रो-सब्र से क़ाबू आया है दिल
हर लम्हा बढ़ते हैं दौर मुश्किलों के

मैं लोगों की भीड़ में तन्हा रहता हूँ
मुझको रंग फ़ीके लगते हैं महफ़िलों के

सन्दली धूप की छुअन का यह जादू है
ख़ुशबू से भर गये जाम गुलों के

मैं यह सोच के जल जाता हूँ सनम
तुम्हें तीर चुभते होंगे मनचलों के

‘नज़र’ आज वाइज़ है बहुत ख़ामोश
क्या उसके पास हल नहीं मसलों के

ज़ाया: बेकार । कँवल: कमल के फूल । वाइज़: बुध्दिजीवी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना
मगर हम शोलों पर भी चलकर जायेंगे
हमें तो चाह है तेरे इश्क़ की रोज़े-अव्वल से
तुम नहीं जानते क्या कर गुज़र जायेंगे

है हर गुल को छूने से तेरा लम्स हासिल
मगर यह चमन इक रोज़ बिखर जायेंगे
लम्हे यह बहुत उदास-उदास हैं तुम बिन
तुम आओगे रंगो-शाद से निखर जायेंगे

मेहरबानिए-इश्क़ कभी तुम हमसे निबाहो
हम बिगड़ी क़िस्मत हैं सँवर जायेंगे
मरना तो एक न एक दिन सबको है हमदम
जान लो तेरे इश्क़ की ख़ातिर मर जायेंगे

सदफ़ में गौहर की तरह दिल में तुम रहते हो
ज़ीस्त है तुमसे, तुम बिन ज़रर जायेंगे
ख़ातिर से अपने तुम नवाज़ दो हमको मेहरबाँ
तेरे दिल तक आँसुओं में बहकर जायेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

क्यों हो गया न प्यार…!

यह प्यार चीज़ क्या है?
दीवानों का है काम
बेकार ही पीछे दौड़ते हैं
बिन सोचे अन्जाम

कहते थे कि प्यार हमको होगा नहीं
क्यों हो गया न प्यार…!

बहुत तन के चलते थे
जब घर से निकलते थे
प्यार में क्या रखा है
बस एक ही बात रटते थे

आज मुँह पर उल्टी आ पड़ी हर बात
क्यों हो गया न प्यार…!

आज क्या हुआ
वह नाक पे बैठा हुआ गुस्सा
चलो लाओ दो हमें
प्यार में हमको हमारा हिस्सा

अजी नज़र चुराकर कहाँ चल दिए
क्यों हो गया न प्यार…!

प्यार ख़ूबसूरत है
यह दिल की ज़रूरत है
दुनिया में बस यही
ख़ुदा की एक इनायत है

आज तुमको हो गया हमपे एतबार
क्यों हो गया न प्यार…!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १० मई २००३

जैसे-तैसे निभाते हैं

जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं
सच्चे-झूठे सपने तेरे
रातों की नींदें उड़ाते हैं

दो किनारे जिससे मिलते हैं
वह पुल टूट गया
बारिश बाढ़ बनी कि फिर
हाथों से हाथ छूट गया

उम्मीदें क्यों रखते हैं
जो अब रोये जाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं

रुसवाई कुछ और नहीं
एक झूठा बहाना है
क्यों करते हो वादे जिनको
बेमानी हो जाना है

कैसे-कैसे लोग यहाँ
जो बस अपनी सुनाते हैं
जैसे-तैसे निभाते हैं
प्यार करके पछताते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

महफ़िले-उश्शाक़ में आशिक़ हम-सा न पाओगे

महफ़िले-उश्शाक़ में आशिक़ हम-सा न पाओगे
बेकार की बातें हैं सभी दिल को कब तक जलाओगे

सहर में शुआ शाम को माह बनके निकलते हो
जिगर में बस गये हो जी को कब तक दुखाओगे

आँखों से हाल बयाँ करना माशूक़ की अदा होती है
देखते हो चुपके-चुपके आँखें कब तक चुराओगे

जो कहोगे हम वही कर गुज़रेंगे दिल से
कब तक करोगे जफ़ाएँ हमें कब तक आज़माओगे

साल यह भी ज़ाया किया हरजागरदी में हमने
होकर जी से नाचार जीते हैं कब तक लौट आओगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३