तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं
तेरे हुस्न के पीछे पागल हूँ मैं
शैदाई दीवाना आवारा बादल हूँ मैं
तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे ख़ाब पलकों में छिपाये फिरता हूँ
गिर न जायें आँसू बनके डरता हूँ
यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

ऊदी-ऊदी साँसों से सीने में जलन है
सूखा-सूखा मेरे दिल का गुलशन है
हैं दूर तक वदियों में पानी की तहें
फिर किसके लिए प्यासा मेरा मन है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम गर हो सीना मुझको बना लो धड़कन

तुम गर हो सीना मुझ को बना लो धड़कन
आतिश बहे नस-नस में मिटे शीत की कम्पन

जिस सूरत पे दिल आ गया उसपे निसार है सब
मेरी यह उम्र, यह जान, यह यौवन

रंग-बिरंगे फूल खिले ख़ुशबू बिखरी हर-सू
मन की तितली फिरती है गुलशन-गुलशन

प्यार का जादू अब हम समझे क्या होता है
हम-तुम दोनों जैसे पानी और चन्दन

अब्रे-मेहरबाँ एक फ़साना रहा मुझको
चन्द्रमा खो गया जिसमें मेरी बढ़ा के लगन

वादा-ए-निबाह न किये फिर भी टूटे मुझसे
है नसीब मुझको बिन चाँद यह स्याह गगन

तेरी नज़र ने ज़िबह किया बारहा मुझको
रहा ताउम्र मुझ पर तेरा ही पागलपन

‘नज़र’ तेरी मेहर को बैठा है आज तलक
मरासिम बना के मुझसे जोड़ लो यह बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ

मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
ज़िन्दगी के इस पुराने करघे पर
कि मैंने कभी सूत भी काता है
रिश्तों के इस टूटे हुए चरख़े पर

आँखें वीरान हैं दूर तक रेत ही रेत है
पानी का कहीं नामो-निशाँ नहीं है
सूरज भी उसकी मुस्कुराहट का ना आया, वो कहाँ है?
मेरी हर रात सूखकर बंजर हो गयी है

मोहब्बत मेरी अफ़साना बन गयी है
मैं रह गया हूँ इक किरदार बनकर…

बेजान यह जिस्म उघड़ने लगा है
रूह पर से सर्प की खाल की तरह
और यह मेरी रूह भी जल रही है
धधकती ख़ुशरंग आग की तरह

वह मुझे मिला था पिछली शामों को, हसीं चाँद जैसे!
उसने भी गुनाह किया है चुप रहकर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मेरी हर नज़र

मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है,
लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है

रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई

यह रात पहाड़ जैसी है कैसे काटे कोई
यह फ़ासले मीलों-से कैसे तय करे कोई
दो पल में बिछड़ जाना ख़ाब जैसा है
इश्क़ आग का दरया है कैसे बुझाये कोई

इस टूटे हुए दिल में वही दर्द पुराने हैं
आँखों में सिमटे हुए गुज़रे ज़माने हैं
तेरी यादों को सीने से लगाके अपना बनाके
यह दूरी दिल से दिल की कैसे मिटाये कोई

यह वीराना तेरे बिना आबाद कैसे होगा
दिल को भी ख़ुशियों का एहसास कैसे होगा
पानी होके लहू आँखों से बहने लगा है
बिगड़ी क़िस्मत अपनी कैसे बनाये कोई


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२