इक बार तेरा चेहरा फिर देख लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

आ फिर आ जा इक बार फिर आ जा
सूखी आँखों से टूटे हैं टुकड़े आँसू के
मैं न कहूँगा कि तू मेरी हो जाये
तस्वीर सजाऊँ आँखों में तू जो आये

चले जाना हाँ बड़े शौक से तुम
मेरा दिल तोड़ के, इक बार आ जा
बोलते हुए कई चेहरे सुने हैं मैंने
किस तरह मैं उनसे बात कर लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

अब के आना तो बस इक शाम
बैठी रहना रू-ब-रू, रू-ब-रू
ना कुछ कहना ना सुनना
पढ़ते रहना मेरी आँखों की ख़ुशबू

आ जा इक बार, लौट के आ जा
फिर दिल मेरा तोड़ के चली जा
इक बार आ जा, बस इक बार आ जा

कभी ख़ाब में न आना तुम
मगर कभी यादों से न जाना तुम
बस इक यही ख़्वाहिश है
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा

अरमानों की डोलियाँ जला दे तू
यह ना उठें कभी ख़ाली सीने से
देखो न रोकना तुम कभी मुझे
तन्हाई पीने से, रातों में रोने से

मेरे सीने के ज़ख़्म हरे करने की
कोई नयी तरक़ीब तू ढूँढ़ के ला,
मैं पैतरे तेरे सब जानता हूँ…

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

यह नज़्म नहीं बयाने-हाल है मेरा
तेरे सिवा किसी और तस्वीर को
तू बता मैं कैसे अपना मान लूँ…

माटी-माटी कर दे मुझे दफ़्न करके
और जियूँ तो मैं जियूँ किस तरह से

क्या चाहती हो क्यों छोड़ा है मुझे
माना मैं तेरा अपना नहीं मगर
सब कुछ ख़ामोशी क़ुबूल करता हूँ
मैं कब तुझे ख़ुद से दूर करता हूँ

आ जा इक बार आ जा फिर आ जा
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा
इक बार फिर छोड़ जा मुझको अकेला
तू इन राहों पर, इन्हीं गलियों में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

न वह कभी आँखों से उतारा ही गया

न वह कभी आँखों से उतारा ही गया
और न कभी लबों से पिया ही गया
वह इक दर्द का बवण्डर था शायद
न जिसे कभी दिल में सँभाला ही गया

इक कहकशाँ की रोशनी भी खप गयी
न ज़रा पलकों को झपकाया ही गया
आधे-आधे दिल से देखा था मैंने उसे
न वह कभी पूरे दिल से देखा ही गया

तारीक़ी ने सिर्फ़ मेरे पाए ही चुने
और न कभी मुझसे भागा ही गया
टुकड़े कर दिये उसने मेरी आँखों के
न यह ग़म मुझसे भिगोया ही गया

धीरे-धीरे वह मुझसे दूर चलता गया
न मुझसे उसके क़रीब जाया ही गया
बारिश ने खनका दीं शीशम की पत्तियाँ
न रोकर इस दिल को बहलाया ही गया

पाए:feet,  तारीक़ी: darkness


 शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह

बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

शाम है और मैं हूँ, तुम क्यों नहीं

शाम है और मैं हूँ, तुम क्यों नहीं, क्यों नहीं
डर-सा बैठा है दिल में तुम्हें खो न दूँ कहीं
तिलिस्म यह मेरी आँखों का टूट न जाये कहीं
तुमने जहाँ छोड़ा था मुझे मैं आज भी हूँ वहीं

यह फूल हल्के गुलाबी यह आसमाँ आसमानी
सब उदास हैं इक तेरे न होने से और मैं भी
वह यादें मुस्कुराती हुई आज रोती हैं तन्हा
मेरे साथ हैं सीने से लगकर, बिलखती हुई

मुँहज़ोर तन्हाई है सीने में, आँसुओं के भँवर
मैं अकेला कब तलक जूझता रहूँगा यूँ ही
तुमको पाने का इरादा है पर तुम यहाँ नहीं
फिर आँखों से गिरह लगा दो कर लूँ ख़ुद पे यक़ीं

मेरा दिल किसी ग़मो-अफ़सोस का घर नहीं
यह वक़्तो-ख़ुदा का फ़ैसला है, हम जुदा हैं
सच्चे प्यार की साँसें टूटती नहीं, न टूटेंगी
यह फ़ासला मिटायेगा आप ख़ुदा मुझे है यक़ीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३