बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

बा-क़ायदा हर्फ़ों में

बा-क़ायदा हर्फ़ों में तेरी तस्वीर लिखी है
जितनी भी सीखी है मोहब्बत’ तुमसे सीखी है

तेरा नाम मेरी धड़कनों में जाविदाँ रहेगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से

बोल तुझे इक हर्फ़ में कैसे लिख दूँ
तस्वीर नहीं बनती है कभी हर्फ़ों से

हर्फ़= word


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है
ज़ख़्म मवाद है आँख मेरी बेआब है

क्यूँ इश्क़ ख़ौफ़ खा रहा है हिज्र से
नस-नस में मेरी कोई ज़हराब है

सुलगते हैं तेरे ख़्याल शबो-रोज़
गलता हुआ तेज़ाब में हर ख़ाब है

जुज़ बद्र कौन मेरा रक़ीब जहाँ में
मेरी ख़ाहिश को लाज़िम कैसा नक़ाब है

भटकती है नज़र किसकी राह में
उल्फ़त को मेरी क्या-क्या हिसाब है

ज़िन्दगी कब शक़ खाती है मौत से
मौत को भी ज़िन्दगी से क्या हिजाब है

हर्फ़ मेरे और तसलीम नहीं देते
कि ‘नज़र’ को दर्द से क्या इताब है

सराब= मरीचिका, Mirage, बेआब= सूखी, ज़हराब= ज़हरीला पानी, जुज़= केवल
बद्र= पूरा चाँद, रक़ीब= दुश्मन, हिजाब=पर्दा, शर्म, इताब= गुस्सा, Rebuke


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तन्हाई मिटाने दो

तन्हाई मिटाने दो
किस्से सुनाने दो
सुबह बह जायेगी
रोशनी उगाने दो

तितलियों के परों-सी
बारिश के घरों-सी
छोटी-सी ज़िन्दगी यह
किताब के हर्फ़ों-सी

आइने में अक्स है
वहाँ कौन शख़्स है
मेंहदी धुल गयी सब
मुझमें नक़्स है

बदली और पवन ने
गुल और चमन ने
मुझको बहकाया है
शिकारी और हरन ने

फ़ुर्क़त में क़ुर्बत जैसे
दर्द में मोहब्बत जैसे
वह याद आये मुदाम
दोस्ती में उल्फ़त जैसे

नाराज़ है कौन यहाँ
हमसे यह सारा जहाँ
किस-किसको मनाऊँ
इक यहाँ, इक वहाँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०५ जून २००३