Four days were dark without my moon

Four days were dark without my moon
four nights were bare without your dream

A moment would be like the hundred years
this ain’t a big sore now as it appears

Butterflies of your smile I didn’t find
o my love, please you come back soon

The shadows of sorrow are chasing my feet
but I am ready to defeat the defeat

You’re the face of love, you’re my life
take my hands and give me little room



words: vinay prajapati
penned: 2003
revised: 2008

वह कब आयेगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इ‍ंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी

हमने राहों में लाखों हसीं देखे हैं
उनकी बाँहों में हमनशीं देखे हैं
मेरी कब कोई हमनशीं होगी
हाँ, मेरी कब कोई हमनशीं होगी
वह जो मेरी जान जाँनशीं होगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
अपना बनाके मुझे इश्क़ सिखायेगी
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी

सोचो बीस बरस गुज़रे तन्हा-तन्हा
अब न रहना मुझे तन्हा-तन्हा
कह दो उसे जाकर मुझे दरस दे
न मुझे दूरी का इक और बरस दे
मेरी जान में जान कब आयेगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इ‍ंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा

उससे कहो अपनी इक झलक दे
ज़मीं तो मिली है थोड़ा फ़लक़ दे
अब जिस्म से जान, अब जायेगी
वह मुझे और कितना तड़पायेगी
विरह की सूनी रतियाँ सुलगायेगी

वह अब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन

तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन

लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन

बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन

तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले

कोई तो तुम्हें पाने की राह मिले
कभी तेरे आगोश में पनाह मिले
मैं शज़रे-धूप की छाँव में बैठा हूँ
कभी तो इनायते-निगाह मिले

तुम हाथ तो बढ़ा दो मेरे मसीहा
ज़ख़्मों पे रख दो मरहम का फीहा
बेबसी में मेरा दम घुटने लगा है
फिर से सौंधी हुई सुबह मिले

रुख़े-ख़ुशी मेरी तरफ़ मोड़ दो
मेरे दर्द का हर तागा तोड़ दो
एक ही ख़ाहिश है मेरी बरसों से
तेरे दिल में मुझे जगह मिले

मैं अपनी कोशिशों में रहूँ क़ाबिल
इस दरिया को मिले तेरा साहिल
तुम्हीं से ज़िन्दगी को मानी मिला है
काश कि तेरी-मेरी हर राह मिले

मुश्किलें सब यह आसाँ हो जायें
जो हम दो जिस्म एक जाँ हो जायें
लम्हों में सदियाँ तय कर चुका हूँ
तेरा-मेरा दिल किसी तरह मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तस्व्वुरे-हुस्नो-सादगिए-‘शीना’

सुबह-सा चेहरा, माथे पर सूरज-सी बिन्दिया
हँसी, जैसे ख़ुशबू हो कोई, गुनगुनाती हुई
आँखें साँवली-सी, कजरारी-सी
ऐसे झुकती और खुलती थीं
जैसे रात पे सुबह का दरिया बहा दिया हो
वह लट जब चेहरे पर गिरती थीं
यूँ लगता था मानो! बादल की ओट में चाँद हो

उसके पाँव की आहट जैसे बादे-सबा फूलों पर
रूप की सादगी ऐसी जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर
रंग बिल्कुल गुले-अंदाम ज़रा-सी बनावट नहीं
लब सुर्ख़ थे ऐसे, जिस तरह गुलाब के पैमाने
ज़ुबाँ नाज़ुक मिज़ाज, वाइज़ो-नासेह की तरह
बदन शीशे जैसा, साफ़-शफ़्फ़ाक़-गुल्फ़ाम
अदा में जुज़ सादगी और कुछ नहीं झलकता था

मालूम नहीं, वह बरस ख़ाब का था कि सच था
उसका वह मेरे घर आना
काँधे से गिरते वह कमर पे दुप्पटे की गाँठ
वह दीपावली के दिए, वह सजावट सब
देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन

आज पाँच बरस हो गये…
I’m still reminiscing about you…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४