यह मौसम भी तुम हो

यह मौसम भी तुम हो,
यह सावन भी तुम हो,
तुम हो… मेरे लिए…
मेरे सनम भी तुम हो

तुम नहीं होते’ तो तुम्हारा एहसास होता है
कोई जगता है रातों में, ख़ाबों के बीज बोता है

यह बिजली भी तुम हो,
यह बदली भी तुम हो,
तुम बूँदों में बरसती हो…
यह रिमझम भी तुम हो

गीले मन को बहुत सुखाया, मगर सूखा नहीं
मन है उदास तेरे लिए, मगर रूखा नहीं

यह अगन भी तुम हो,
यह लगन भी तुम हो,
तुम हो मन-दरपन…
मेरा दरपन भी तुम हो

कितनी बार देखा है, साहिलों पर खड़े हुए
तुम आ रही हो, मुझको ढूँढ़ते-पुकारते हुए

यह जीवन भी तुम हो,
यह धड़कन भी तुम हो,
तुमसे है मेरा यौवन…
मेरा यौवन भी तुम हो

इश्क़ ने ढूँढ़ा तुझे, प्यार ने छूना चाहा तुझे
मैं तेरा प्यार हूँ, आवारा न समझ मुझे

यह मौसम भी तुम हो,
यह सावन भी तुम हो,
तुम हो… मेरे लिए…
मेरे सनम भी तुम हो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

Published by

Vinay Prajapati

Vinay Prajapati 'Nazar' is a Hindi-Urdu poet who belongs to city of tahzeeb Lucknow. By profession he is a fashion technocrat and alumni of India's premier fashion institute 'NIFT'.

5 thoughts on “यह मौसम भी तुम हो”

  1. यह जीवन भी तुम हो,
    यह धड़कन भी तुम हो,
    तुमसे है मेरा यौवन…
    मेरा यौवन भी तुम हो
    क्
    या बात है बहुत खूब सूरत है आपका अंदाज़
    मेरा सलाम

  2. कितनी बार देखा है, साहिलों पर खड़े हुए
    तुम आ रही हो, मुझको ढूँढ़ते-पुकारते हुए

    बहुत ही अच्‍छी रचना

  3. बहुत-बहुत शुक्रिया आप सभी का,हार्दिक अभिनन्दन |

  4. यह बिजली भी तुम हो,
    यह बदली भी तुम हो,
    तुम बूँदों में बरसती हो…
    यह रिमझम भी तुम हो
    क्या बात है भाई…वाह…कमाल किया है आपने शब्दों से…वाह.
    नीरज

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