रोना था इसलिए मिला मैं तुझे

सावन बदल गया, मुआ टल गया
घोर अंधेरा था, दिया जल गया
बातें तेरी… भूल जाऊँ दिलाँ…
टूटा-टूटा अश्क भी गल गया

sawan badal gayaa, mu’aa Tal gayaa
ghor andhera tha, diyaa jal gayaa
baatein terii… bhool jaau’n dilaa’n…
TooTaa-TooTaa ashk bhii gal gayaa

रुक-रुक कर ये रास्ता चला है
थम-थम कर ये फ़ासला बढ़ा है
सूरज थामा था लेकिन ढल गया

ruk-ruk kar ye raasta chalaa hai
tham-tham kar ye faasla badh.aa hain
sooraj thaamaa thaa lekin dhal gayaa

रोना था इसलिए मिला मैं तुझे
ये मेरा दर्द मैं सुनाऊँ किसे?
छोटा-सा लम्हा मुझे खल गया

ronaa thaa isliye milaa main tujhe
ye meraa dard main sunaa’un kisey
chhoTa-sa lamhaa mujhe khal gayaa

बह्र: 222 2212 212
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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 01:00 25-08-2014
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 01:00 25-08-2014

सावन की बदली बरसने लगी है

सावन की बदली बरसने लगी है
माटी ये सौंधी महकने लगी है
मेरा मन तेरे बारे में सोचता है
धड़कन सीने में गरजने लगी है

हर एक गली में पानी भरा हुआ है
काग़ज़ की नाव का चलना हुआ है
खिड़कियों पर बूँदें बिखरी हुईं हैं
बाग़ की कली-कली हँसने लगी है

मैंने तेरे नाम ख़त रोज़ लिखे थे
सँभाल कर तुझे देने को रखे थे
मैं आज उन्हें खोलकर पढ़ता हूँ
इन आँखों से तू छलकने लगी है

फिर कैसे भी तुझसे मेरी राह जुड़े
तू मुझे मिलकर चाहे रोज़ लड़े
पर ज़िंदगी की हर सुबह तुझसे है
ये फ़िज़ा ये हवा बहकने लगी है

विनय प्रजापति ‘नज़र’
रचनाकाल: 2011

Lyrics:

saawan kii badalii barasne lagii hai
maaTii ye sauNdhii mahkane lagii hai
meraa man tere baare mein sochtaa hai
dhaD.kan seene mein garazne lagii hai

har’ek galii mein paanii bharaa huaa hai
kaaghaz kii naav ka chalnaa huaa hai
khiD.akiyoN par booNdein bikhrii huiiN haiN
baagh kii kalii-kalii haNsne lagii hai

maine tere naam kh.at roz likhe likhe the
saMbhaalkar tujhe dene ko rakhe the
main aaj unhein kholkar paDhataa huuN
in aaMkhoN se tuu chhalakne lagii hai

phir kaise bhii tujhse merii raah juD.e
tuu mujhse milkar chaahe roz laD.e
par zindagii kii har subah tujhse hai
ye fizaa ye hawaa bahakne lagii hai

– Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 2011

Vocal by Vinay Prajapati ‘Nazar’

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
दिल के कोने-कोने तक छितरे हुए

वह अब कहाँ बाक़ी जो था मुझमें
मैं अब कहाँ ढूँढू जो था तुझमें
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

भीगी-भीगी थी ज़मीं सूखे पाँव थे
जलते-बुझते पुराने घाव थे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

जुगनू दो आँखों में तिरने लगे हैं
चिन्गारियों से चुभने लगे हैं
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

बुझते हुए दिए को जलाऊँ कैसे
दबी हसरतों को बुझाऊँ कैसे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल

यह ना जानूँ मैं जानाँ के क़ाबिल हूँ या नहीं
इक अरसे से दौरे-मोहब्बत में गिरफ़्तार हूँ मैं
बाइसे-सोज़े-दिल जो खुला, तुम्हारा तस्व्वुर था
नहीं जानता कि हूँ क्या मगर तेरा प्यार हूँ मैं

दौलते-जहाँ से क्या मिलेगा बिना तेरे मुझको
देख समन्दरे-दर्द को ख़ुद दर्द बेशुमार हूँ मैं
न सहर देखी कोई’ न कोई शाम देखी है मैंने
तेरे बाद सोज़े-दिल से बहुत बेइख़्तियार हूँ मैं

ख़ालिक से हर दुआ में मैंने माँगा है तुझको
मुझे तेरी चाह है तेरे प्यार का तलबगार हूँ मैं
जीता हूँ इस आस पे इक रोज़ मिलूँगा तुमसे
अपने मर्ज़े-दिल का ख़ुद ही ग़म-गुसार हूँ मैं

आइने में जब देखा, ख़ुद को पाया है कमशक्ल
क्या करूँ जैसा भी हूँ तुझपे जाँ-निसार हूँ मैं
ज़रूर बयाँ करूँगा अपना अरसे-मुहब्बत तुझसे
ना करूँ अगर तो भी कहाँ मानिन्दे-बहार हूँ मै


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४