मानूस हर्फ़

शाम उतर रही थी,
मैं सोफ़े पे लेटा
अपने सफ़र की थकान
उतार रहा था…
हाँ, उसी शाम
उसका… फ़ोन तो आया था,
कि घर आएगी वो…

कहीं बाहर मिलने का भी…
प्लान बना था

लेकिन –
घर के दरवाज़े
आज भी… मेरी तरफ़ देखते हैं,
पूछते हैं मुझसे…

चौखट के इस पार…
और चौखट के उस पार में
कितना फ़ासला है?

किसी ख़ार में उसका दामन
अटका है… या फिर,
वक़्त ने बहला-फुसला लिया उसे…

वो आयी नहीं
चैट हो जाया करती है कभी-कभी
उसके मानूस हर्फ़, वो कहती नहीं मगर
सीले-सीले से लगते हैं
जिन्हें वो शायद टीसू पेपर
या रूमाल से पोंछती रहती है

कि शायद कहीं…
मेरे उजाड़ दिल की दीवारों पर
काई न जमने लगे

Penned: 15:05 04-11-2014
© Vinay Prajapati, All rights reserved.

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